
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट को वीरवार को बताया गया कि कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों के दौरान कथित हिंसा और पुलिस ज्यादती की जांच कर रही शीर्ष अदालत द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीईसी) को अब तक हिंसा से प्रभावित लोगों की बहुत कम शिकायतें मिली हैं। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति के पास पर्याप्त सामग्री नहीं होने के कारण वह 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन के दौरान की कथित हिंसा पर फिलहाल कोई निष्कर्ष निकालने की स्थिति में नहीं है।



शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि हिंसा से संबंधित याचिकाएं, वीडियो और शिकायतें समिति को भेजी जाएं। समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा, दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश शालिंदर कौर, सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के पूर्व पुलिस महानिदेशक एल आर बिश्नोई भी शामिल हैं। अदालत ने समिति से नियमित अंतराल पर अंतरिम रिपोर्ट सौंपने को कहा। समिति ने अदालत को बताया कि उसने 20 जुलाई को दिल्ली में संसद की ओर कॉजपा के नेतृत्व में निकाले गए मार्च के दौरान हुई हिंसा के संबंध में शिकायतें देने के लिए 149 समाचार पत्रों में नोटिस प्रकाशित कराए थे। हालांकि, उसे ऑनलाइन या व्यक्तिगत रूप से बहुत कम शिकायतें मिलीं।
समिति ने बताया कि उसने 21 अक्टूबर को एक बार फिर शिकायतें आमंत्रित कीं और अपने ऑनलाइन पोर्टल तथा कार्यालय के पते का विवरण साझा किया। शीर्ष अदालत ने अगस्त में कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इस समिति के गठन का आदेश दिया था। इन याचिकाओं में कॉजपा के नेतृत्व में हुए आंदोलन के दौरान छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की ज्यादती का आरोप लगाया गया था। वहीं, पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा के आरोप भी लगाए गए थे। मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़पें हुई थीं।
संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाकर्मियों ने लाठीचार्ज किया था और आंसू गैस के गोले छोड़े थे। छात्रों के नेतृत्व में शुरू हुआ यह प्रदर्शन कई शहरों तक फैल गया था। प्रदर्शनकारी तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े थे। यह आंदोलन 20 जून को जंतर-मंतर से शुरू हुआ था और 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तथा सरकार द्वारा कॉजपा की अन्य मांगें स्वीकार किए जाने के बाद समाप्त हुआ था।

