
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को उत्तराधिकार में पुरुषों के बराबर अधिकार देने की मांग के मामले पर सुनवाई करते हुए मंगलवार को एक बार फिर खुलकर समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए उसके पक्ष में अपना रुख व्यक्त किया।कोर्ट ने कहा कि इसका उत्तर समान नागरिक संहिता है। यह पहला मौका नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट कई बार समान नागरिक संहिता के पक्ष में मत व्यक्त कर चुका है। अभी देश में सिर्फ दो राज्य हैं जहां समान नागरिक संहिता लागू है। एक गोवा और दूसरा उत्तराखंड।दो राज्यों में है व्यवस्था : गोवा में यह बहुत पहले से लागू है, जबकि उत्तराखंड में हाल में लागू हुई है। पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का मामला केंद्र सरकार ने विचार के लिए विधि आयोग को भेजा था, जो अभी भी आयोग के समक्ष विचाराधीन है।समान नागरिक संहिता की तरफदारी करने वाली उक्त टिप्पणियां प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जोयमाल्या बागची और आर. महादेवन की पीठ ने शरिया एक्ट, 1937 को महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण बताते हुए उसे रद करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कीं।याचिकाकर्ता पौलोमी पवनी शुक्ला व अन्य की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जैसे ही बहस शुरू की। तभी प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अगर कोर्ट 1937 के शरिया कानून को रद कर देता है तो मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार के बारे में कानूनी शून्यता नहीं उत्पन्न हो जाएगी और उस स्थिति में क्या होगा।प्रशांत भूषण ने रखी दलील : भूषण ने कहा कि यह कानून महिलाओं के साथ भेदभाव करता है, इसलिए रद होना चाहिए। उत्तराधिकार धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं है। इसे रद करने से कानूनी शून्यता नहीं उत्पन्न होगी। इसकी जगह भारतीय उत्तराधिकार कानून लागू हो जाएगा। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि कहीं हम सुधारों के प्रति अति उत्साह में उन्हें वंचित न कर दें। उन्हें अभी जो मिल रहा है, उससे भी कम मिल सकता है। इस बारे में कुछ होमवर्क होना चाहिए कि अगर 1937 के कानून को रद किया जाता है तो क्या होगा।भूषण ने कहा कि कोर्ट यह कह सकता है कि मुस्लिम महिलाओं को भी उत्तराधिकार में बराबरी का हक होगा। इस पर कोर्ट ने पर्सनल ला के बारे में नरसू अप्पू माली केस में दिए पूर्व फैसले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि पर्सनल ला को मौलिक अधिकारों के हनन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।जस्टिस बागची की अहम टिप्पणी : तभी पीठ के दूसरे न्यायाधीश जोयमाल्या बागची ने भूषण से कहा कि भेदभाव के मुद्दे पर आपका केस बहुत मजबूत है, लेकिन क्या यह उचित नहीं होगा कि कोर्ट इस मामले को विधायिका के विवेक पर छोड़ दे, जिसे राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के अनुसार समान नागरिक संहिता लागू करने का अधिकार है।प्रधान न्यायाधीश ने सहमति जताते हुए कहा कि उसका उत्तर समान नागरिक संहिता है। कोर्ट ने याचिका संशोधित करने का समय देते हुए सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी।

