
रांची। विद्यालयों द्वारा परिसर में पुस्तक बिक्री की प्रथा पर पूर्ण रोक लगा दी गई है। अभिभावक खुले बाजार से किसी भी विक्रेता से पुस्तकें खरीद सकते हैं और विद्यालय उन्हें किसी विशेष दुकान या प्रकाशक से खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकेगा। सीबीएसई से संबद्ध विद्यालयों को केवल एनसीइआरटी पुस्तकों को ही पाठ्यक्रम में शामिल करने का निर्देश दिया गया है। सहायक पुस्तकों को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकेगा। साथ ही, पुस्तकों में बार-बार बदलाव पर रोक लगाते हुए कहा गया कि केवल 5 वर्ष या पाठ्यक्रम परिवर्तन की स्थिति में ही बदलाव संभव होगा।
यह निर्देश उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री ने मोरहाबादी स्थित आर्यभट्ट सभागार में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान दिए। जिले के निजी विद्यालयों के लिए प्रशासन ने पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अब सभी निजी विद्यालयों को विगत तीन शैक्षणिक सत्रों के साथ-साथ चालू सत्र 2026-27 में कक्षावार व विभिन्न मदों में लिए गए सभी शुल्कों का विस्तृत विवरण 20 अप्रैल की संध्या पांच बजे तक जिला शिक्षा अधीक्षक कार्यालय में अनिवार्य रूप से जमा करना होगा।
तय समय सीमा का पालन नहीं करने वाले विद्यालयों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। जिले के निजी विद्यालयों के प्राचार्यों और प्रतिनिधियों को स्पष्ट रूप से बताया गया कि शिक्षा व्यवस्था में मनमानी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी और सभी संस्थानों को कानून के दायरे में रहकर कार्य करना होगा।
पीटीए गठन अनिवार्य, 3 दिनों में देनी होगी सूचना : उपायुक्त ने अभिभावकों की भागीदारी को शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए सभी विद्यालयों में अभिभावक-शिक्षक संघ (पीटीए) का गठन अनिवार्य कर दिया। उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि अब तक केवल 13 विद्यालयों ने ही पीटीए गठन की सूचना उपलब्ध कराई है। सभी विद्यालयों को निर्देश दिया गया कि वे अगले 3 दिनों के भीतर हार्ड कॉपी और ईमेल के माध्यम से इसकी जानकारी जिला शिक्षा अधीक्षक कार्यालय को उपलब्ध कराएं।
पीटीए की जानकारी विद्यालय के नोटिस बोर्ड और आधिकारिक वेबसाइट पर प्रदर्शित करना भी अनिवार्य किया गया है, ताकि अभिभावकों को इसकी जानकारी आसानी से मिल सके।
शुल्क वृद्धि पर सख्त नियम लागू : बैठक में शुल्क वृद्धि को लेकर स्पष्ट और सख्त दिशा-निर्देश दिए गए। विद्यालय स्तर की समिति अधिकतम 10 प्रतिशत तक शुल्क वृद्धि को स्वीकृति दे सकती है, जबकि इससे अधिक वृद्धि के लिए जिला स्तरीय शुल्क निर्धारण समिति की अनुमति अनिवार्य होगी।इसके अलावा, एक बार बढ़ाया गया शुल्क न्यूनतम दो वर्षों तक प्रभावी रहेगा, जिससे अभिभावकों पर बार-बार आर्थिक बोझ न पड़े।
उपायुक्त ने साफ कहा कि किसी भी छात्र को अगली कक्षा में प्रोन्नत करने के लिए पुननार्मांकन शुल्क लेना पूरी तरह अवैध है। यदि कोई विद्यालय इस प्रकार का शुल्क लेता है, तो उसे अधिनियम का उल्लंघन माना जाएगा और संबंधित विद्यालय के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी।
