
हजारीबाग/केरेडारी। केरेडारी कोयला खनन परियोजना अवैध वसूली का अड्डा बन चुकी है। एसजीपी और एमजीपी के नाम पर दिनदहाड़े करोड़ों की लूट मची है और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है। घरों में फर्जी कार्यालय खोलकर बैठे दबंग रोज हाइवा मालिकों की जेब काट रहे हैं। हर कोल वाहन से प्रति टन 10 रुपये दो, वरना कोयला नहीं मिलेगा का फरमान जारी है। रोज 400-500 हाइवा से जबरन 1.25 लाख रुपये तक की उगाही हो रही है। महीने का हिसाब जोड़ें तो 37 लाख से ज्यादा और साल का 4.5 करोड़ से ऊपर का काला कारोबार सिर्फ एक परियोजना से चल रहा है। हाइवा मालिकों की मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है। बोलोगे तो गाड़ी बंद, घर में चूल्हा कैसे जलेगा? इस डर से सब खामोश हैं। किस्त और परिवार पालने के लिए रोज लुटना उनकी नियति बन गई है। इतना बड़ा रैकेट बिना मिलीभगत के कैसे चल सकता है? आरोप सीधे-सीधे ट्रांसपोर्टरों और एनटीपीसी के कुछ अधिकारियों पर लग रहे हैं। कहा जा रहा है कि इस लूट में ऊपर से नीचे तक सबका हिस्सा बंधा है। सफेदपोश से लेकर कंपनी के बाबू तक, सबकी जेब गर्म हो रही है।स्थानीय दबंगों ने खुली धमकी दे रखी है कि जो 10 रुपये प्रति टन नहीं देगा, उसकी गाड़ी में कोयला लोड नहीं होगा। घरों में बोर्ड लगाकर संगठन के नाम पर कार्यालय चल रहे हैं, लेकिन असल में ये वसूली के अड्डे हैं। जानकारों की मानें तो अगर सीबीआई या इडी ने इस सिंडिकेट की जांच शुरू की तो कई रसूखदारों के चेहरे बेनकाब होंगे। बड़े-बड़े सफेदपोश और कंपनी के अधिकारी सीधे जेल की सलाखों के पीछे होंगे। फिलहाल एनटीपीसी प्रबंधन और जिला प्रशासन ने चुप्पी साध रखी है। उनकी यह खामोशी कई सवाल खड़े कर रही है। क्या करोड़ों की इस लूट को आधिकारिक संरक्षण मिला हुआ है?
