नालंदा । सनातन आस्था, अद्वितीय अध्यात्म और सदियों पुरानी परंपरा की पावन भूमि राजगीर में एक महीने तक चलने वाले विश्वप्रसिद्ध मलमास (पुरुषोत्तम) मेले का भव्य और ऐतिहासिक शुभारंभ हो गया है। रविवार को बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने ब्रह्मकुंड परिसर में पूरे विधि-विधान के साथ वैदिक मंत्रोच्चार, विशेष पूजा-अर्थना और ध्वजारोहण कर इस विराट मेले का विधिवत उद्घाटन किया। उद्घाटन के इस पावन क्षण में जब मंगल आरती शुरू हुई, तो पूरा कुंड क्षेत्र हर-हर महादेव के जयघोष और पवित्र वैदिक मंत्रों की ध्वनियों से गुंजायमान हो उठा, जिसने पूरे वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय और अलौकिक बना दिया।

धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अधिमास या मलमास के इस अत्यंत पावन अवसर पर 17 मई से लेकर 15 जून तक पूरे ब्रह्मांड के 33 कोटि देवी-देवता राजगीर की इस पवित्र धरती पर वास करते हैं। यही कारण है कि देश के कोने-कोने से लाखों-करोड़ों श्रद्धालु इस पावन काल में यहां खिंचे चले आते हैं और ब्रह्मकुंड समेत विभिन्न गर्म जल के कुंडों में आस्था की डुबकी लगाते हैं। सनातन धर्म में यह दृढ़ विश्वास है कि मलमास के दौरान राजगीर में स्नान, दान, जप-तप और भगवान विष्णु की आराधना करने से मनुष्य को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और उसके जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश हो जाता है।

मलमास मेले के दौरान ब्रह्मकुंड के साथ-साथ वैतरणी नदी भी श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का मुख्य केंद्र बनी हुई है। शास्त्रों के अनुसार, इस विशेष एक महीने की अवधि में गया जी में पिंडदान नहीं किया जाता, क्योंकि सभी देवी-देवता और पितर इस दौरान राजगीर में ही विराजमान रहते हैं। इसलिए वैतरणी नदी के तट पर पिंडदान और तर्पण करने से पूर्वजों को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहां वैतरणी नदी में गाय की पूंछ पकड़कर नदी पार करने की एक बेहद अनूठी और प्राचीन परंपरा है, जिसके बारे में मान्यता है कि ऐसा करने से वक्ता संसार रूपी भवसागर को पार कर परमपद को प्राप्त होता है।

कागभुशुंडी की कथा और कौओं से जुड़ी अनूठी पौराणिक मान्यता

इन सबके बीच, राजगीर के ब्रह्मकुंड क्षेत्र से जुड़ी कौओं की एक अत्यंत रोचक और पौराणिक कथा भी श्रद्धालुओं के बीच कौतूहल का विषय बनी रहती है। ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन काल में जब ब्रह्मकुंड परिसर में एक विशाल महायज्ञ का आयोजन हुआ था, तब उसमें सृष्टि के सभी 33 कोटि देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया था, परंतु भूलवश कागभुशुंडी (कौआ देव) को इसका निमंत्रण नहीं मिल सका। इस बात से नाराज होकर कौए हमेशा के लिए राजगीर की सीमा छोड़कर चले गए। यही वजह है कि आज भी इस पावन कुंड परिसर के आसपास एक भी कौआ दिखाई नहीं देता, जो इस स्थल के अलौकिक प्रभाव को दर्शाता है।

Share.
Leave A Reply

Exit mobile version