
नई दिल्ली। बीजेपी ने एनडीए की ओर से पहले ही उपराष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर सीपी राधाकृष्णन का नाम घोषित करके विपक्ष और पूरे इंडिया ब्लॉक पर बढ़त बना ली है। पहली बात तो ये है कि एनडीए के पास संसद के दोनों सदनों में इसके लिए पर्याप्त आंकड़े हैं। जीत के लिए 392 सांसदों का समर्थन चाहिए और एनडीए के पास 427 एमपी हैं। यही नहीं, विपक्ष के कई दल और सांसद भी इस चुनाव में एनडीए प्रत्याशी का समर्थन कर सकते हैं। विपक्षी नेताओं ने अभी से इसके संकेत देने शुरू कर दिए हैं और इतिहास भी गवाह है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में विपक्षी सांसदों को एकजुट बनाए रखना आखिरकार टेढ़ी खीर साबित होती रही है। कुल मिलाकर कहें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सत्ताधारी एनडीए ने कांग्रेस की अगुवाई वाले विपक्ष को उपराष्ट्रपति चुनाव से पहले ही राजनीतिक शिकस्त दे दी है।
इंडिया ब्लॉक में राधाकृष्णन पर मंथन : सीपी राधाकृष्णन अभी महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं। वहां लोकसभा में चुनाव जीतने के बाद विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) की विधानसभा चुनावों में जिस कदर हार हुई, उसने सत्तापक्ष (महायुति) और विपक्ष के बीच की सियासी खाई को बहुत ही चौड़ी कर रखी है। राज्य के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के खिलाफ एमवीए दलों की खुन्नस पूरा देश जानता है। लेकिन, जब से राधाकृष्णन प्रदेश के गवर्नर बने हैं, उनको लेकर विपक्ष से शिकायतें सुनने को नहीं मिली हैं। यही वजह है कि जब एनडीए ने उपराष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में उनका नाम लिया तो उद्धव ठाकरे की पार्टी के नेता और सांसद संजय राउत ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, ‘वे बहुत ही अच्छी शख्सियत और गैर-विवादित हैं। उनके पास बहुत ज्यादा अनुभव है। मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं।’ राउत उन नेताओं में से हैं, जो कांग्रेस नेता राहुल गांधी की इन दिनों फर्स्ट लेफ्टिनेंट बने हुए हैं। लेकिन, इंडिया ब्लॉक के औपचारिक फैसले से पहले उन्होंने अपनी मंशा जाहिर कर दी है कि एनडीए उम्मीदवार उन्हें अच्छे लग रहे हैं। एक वरिष्ठ एनडीए नेता ने कहा है,’डीएमके और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों की राधाकृष्णन के खिलाफ लड़ने की तत्परता से ही यह तय होगा कि हमारे पास कोई प्रत्याश होगा या यह सर्वसम्मति से उपराष्ट्रपति का चुनाव होगा।’
सीपी राधाकृष्णन तमिलनाडु के मंजे हुए राजनेता रहे हैं। उन्होंने अपनी लंबी सियासी पारी में प्रदेश में बीजेपी को स्थापित करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन, तमिलनाडु जैसे राज्य में, जहां राजनीतिक धारा बहुत ही कट्टरता के साथ बिखरी हुई है, उनका व्यक्तित्व ऐसा है, जो डीएमके को भी खटक नहीं रहा है। यही वजह है कि डीएमके ने उन्हें उपराष्ट्रपति उम्मीदवार बनाए जाने को एनडीए का अच्छा फैसला बताया है। पार्टी प्रवक्ता टीकेएस एलंगोवन ने एनडीटीवी से कहा है, ‘यह स्वागत योग्य कदम है। वे (सीपी राधाकृष्णन) तमिल हैं और बहुत लंबे समय के बाद एक तमिल भारत का उपराष्ट्रपति बनेगा।….’हालांकि, उन्होंने यह भी कहा है डीएमके इंडिया ब्लॉक में है और वह गठबंधन के फैसले पर अपना निर्णय लेगा। तमिलनाडु में अगले साल ही विधानसभा चुनाव होने हैं। यह भी लगभग तय है कि मुख्य विपक्षी एआईएडीएमके उनकी उम्मीदवारी का समर्थन कर सकती। ऐसे में डीएमके लिए उनका विरोध करना पॉलिटिकली करेक्ट फैसला नहीं माना जाएगा।
ओबीसी नेता हैं सीपी राधाकृष्णन : अगर सीपी राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति चुने जाते हैं तो जगदीप धनखड़ के बाद वे ऐसे दूसरे ओबीसी नेता होंगे, जिन्हें राष्ट्रपति के बाद देश के दूसरे नंबर का पद मिलेगा। राहुल गांधी अभी ओबीसी राजनीति की कोशिश में जुटे हुए हैं। जाति जनगणना की उनकी मांग के पीछे असल में ओबीसी वोट बैंक को ही कांग्रेस के साथ जोड़ने की कोशिश है। इनके अलावा ज्यादातर क्षेत्रीय दल ओबीसी की ही राजनीति कर रहे हैं। अक्टूबर-नवंबर में बिहार विधानसभा का चुनाव होना है और प्रदेश की पूरी राजनीति ही अब ओबीसी केंद्रित है। ऐसे में एक ओबीसी उम्मीदवार का विरोध करना विपक्ष के लिए आसान नहीं होगा।
