रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने समाज कल्याण विभाग में लगभग 25 वर्षों तक प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत रहे कर्मचारी संतोष कुमार के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उनके नियमितीकरण का आदेश दिया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने राज्य सरकार के 1 नवंबर 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें संतोष कुमार के समायोजन (नियमितीकरण) के दावे को खारिज किया गया था।

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि संतोष कुमार की सेवा नियमित करते हुए उन्हें सभी सेवा एवं सेवानिवृत्ति संबंधी लाभ उपलब्ध कराए जाएं। साथ ही आदेश की प्रति प्राप्त होने के 10 सप्ताह के भीतर पूरी प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी से लगभग 25 वर्षों तक लगातार एक ही विभाग में कार्य लिया जाता है, उसे मूल संस्था में वापस नहीं भेजा जाता और वह वहीं से सेवानिवृत्त होता है, तो ऐसी स्थिति को केवल प्रतिनियुक्ति नहीं माना जा सकता, बल्कि यह समायोजन (नियमितीकरण) का मामला है।

याचिका के अनुसार संतोष कुमार की नियुक्ति वर्ष 1983 में छोटानागपुर रीजनल हैंडलूम वीवर्स को-ऑपरेटिव यूनियन में हुई थी। वर्ष 1997 में राज्य सरकार की नीति के तहत उन्हें समाज कल्याण विभाग में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया था। इसके बाद वे लगातार उसी विभाग में कार्यरत रहे, लेकिन उनका नियमितीकरण नहीं किया गया। वर्ष 2022 में उन्हें 58 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त कर दिया गया, जबकि सहकारी संस्था के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष निर्धारित की जा चुकी थी।

राज्य सरकार ने नियमितीकरण से इनकार करते हुए विभागीय कार्रवाई और निलंबन का हवाला दिया था। हालांकि हाई कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को केवल मामूली दंड दिया गया था। यदि सरकार उनकी कार्यप्रणाली से असंतुष्ट होती, तो उन्हें पहले ही मूल संस्था में वापस भेज दिया जाता। इसके विपरीत, सरकार ने उन्हें सेवानिवृत्ति तक विभाग में कार्य करने दिया, जिससे उनकी सेवा संतोषजनक होने का संकेत मिलता है।

अदालत ने सरकार के उस दावे को भी खारिज कर दिया कि कर्मचारी की सेवा पुस्तिका अधूरी और अप्रमाणित थी। रिकॉर्ड के आधार पर अदालत ने माना कि सेवा पुस्तिका सेवानिवृत्ति तक विधिवत सत्यापित थी। साथ ही निलंबन अवधि के दौरान उन्हें नियमानुसार निर्वाह भत्ता तथा बाद में वेतन का भुगतान भी किया गया था। इसलिए उनकी सेवा में किसी प्रकार का अवरोध नहीं माना जा सकता।

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