
पटना। पटना हाई कोर्ट ने तलाक के एक मामले में कहा कि विवाह विच्छेद के बाद भी पति अपनी पत्नी की आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन-यापन की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त नहीं हो जाता।शिवहर जिले के एक मामले में कोर्ट ने तलाक की डिक्री बरकरार रखते हुए पति को अपनी कानूनी रूप से हस्तांतरण योग्य कृषि भूमि में से एक कट्ठा जमीन पत्नी को स्थायी भरण-पोषण के तौर पर देने का आदेश दिया है।साथ ही पत्नी को हर माह 10 हजार रुपये देने को कहा है। जमीन तीन महीने में हस्तांतरित करनी होगी। न्यायाधीश बिबेक चौधुरी और न्यायाधीश राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने सोमवार को पूनम कुमारी की अपील पर यह फैसला सुनाया।
कोर्ट ने शिवहर फैमिली कोर्ट के 30 जून 2022 के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति रमेश प्रसाद को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(आईए) के तहत पत्नी की क्रूरता के आधार पर तलाक दिया गया था। दोनों की शादी 13 मई 2002 को हुई थी। कोई संतान नहीं है।पति का आरोप था कि पत्नी उसे माता-पिता और भाई से अलग रहने के लिए दबाव देती थी। इसके बाद भी वैवाहिक विवाद जारी रहा। दिसंबर 2014 से दोनों अलग रह रहे हैं। पत्नी ने पति और ससुरालवालों पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने और मारपीट का आरोप लगाया था।
उसका कहना था कि वह पति के साथ रहने को तैयार है। हाई कोर्ट ने कहा कि मानसिक क्रूरता का फैसला किसी एक घटना के आधार पर नहीं किया जा सकता। पूरे वैवाहिक जीवन, पक्षकारों के व्यवहार और लंबे अलगाव की परिस्थितियों को समग्र रूप से देखना होगा।कोर्ट ने पाया कि वर्ष 2014 से अलग रह रहे दंपती के बीच वैवाहिक संबंध इस स्तर तक बिगड़ चुका था कि सामान्य वैवाहिक जीवन बहाल होने की उम्मीद नहीं थी, इसलिए तलाक की डिक्री में हस्तक्षेप का आधार नहीं है।
पति ने पत्नी के निजी शिक्षक होने और 10 हजार रुपये प्रतिमाह कमाने का दावा किया था, लेकिन इसके समर्थन में कोई दस्तावेज नहीं दे सका।दूसरी ओर, रिकॉर्ड में पति की कृषि भूमि और कारोबार सामने आया। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने पत्नी के लिए एक कट्ठा जमीन और 10 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण तय किया। पहले से मिल रहे पांच हजार रुपये प्रतिमाह का नई राशि में समायोजन होगा।
