नई दिल्ली । उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के सोमवार शाम अचानक पद से इस्तीफा देने से उनके उत्तराधिकारी की दौड़ शुरू हो गई है। बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को निर्वाचक मंडल में बहुमत प्राप्त है, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य शामिल हैं। आगामी दिनों में संभावित नामों पर विचार किए जाने की संभावना है। बीजेपी के पास इस पद पर चुनने के लिए नेताओं का एक बड़ा समूह है। राज्यपालों में से या संगठन के अनुभवी नेताओं, केंद्रीय मंत्रियों में से किसी का चुनाव किया जा सकता है। धनखड़ भी उपराष्ट्रपति बनने से पहले पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे।

जगदीप धनखड़ ने सोमवार शाम स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजे अपने त्यागपत्र में धनखड़ ने कहा कि वह स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने के लिए तत्काल प्रभाव से पद छोड़ रहे हैं। 74 साल के धनखड़ ने अगस्त 2022 में उपराष्ट्रपति का पदभार संभाला था और उनका कार्यकाल 2027 तक था। अब धनखड़ के अचानक इस्तीफे के बाद सवाल उठ रहे कि अगला उपराष्ट्रपति कौन होगा।

उपराष्ट्रपति के रूप में कौन निर्वाचित हो सकता है : कोई व्यक्ति उपराष्ट्रपति के रूप में तब तक निर्वाचित नहीं हो सकता जब तक कि वह भारत का नागरिक न हो। 35 वर्ष की आयु पूरी न कर चुका हो। राज्यसभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित होने के लिए योग्य न हो। वह व्यक्ति भी पात्र नहीं है, जो भारत सरकार या राज्य सरकार या किसी अधीनस्थ स्थानीय प्राधिकरण के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता हो।

केवल सांसद चुनते हैं उपराष्‍ट्रपति : देश में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दो सबसे अहम संवैधानिक पद हैं। इन दोनों पदों के लिए चुनाव देश की जनता सीधे न कर अप्रत्यक्ष तरीके से करती है। यानी इसका चुनाव जनता की बजाय उनकी ओर से चुने गए जनप्रतिनिधि करते हैं। लेकिन अंतर यह है कि राष्ट्रपति के चुनाव में सांसदों और राज्‍यों के विधानमंडलों के सदस्य भी वोट करते हैं। उपराष्ट्रपति चुनाव में सिर्फ सांसदों को ही वोटिंग का अधिकार होता है।

मनोनीत सदस्‍य भी कर सकते वोटिंग : दोनों में एक और बड़ा फर्क यह भी है कि राष्ट्रपति के चुनाव में किसी भी सदन के मनोनीत सदस्यों को वोटिंग का अधिकार नहीं होता, केवल चुने हुए जनप्रतिनिधि वोट कर सकते हैं। वहीं उपराष्ट्रपति के चुनाव में राज्यसभा और लोकसभा के मनोनीत सदस्य भी वोट डाल सकते हैं। उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव अधिकारी की भूमिका संसद के दोनों सदनों में किसी एक सदन के महासचिव बारी-बारी से निभाते हैं।

यह है चुनने की प्रक्रिया : उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार को कम-से-कम 20 सांसद बतौर प्रस्तावक और 20 सांसद बतौर समर्थक दिखाना होता है। ये शर्तें पूरी होने पर ही वह नामांकन कर सकता है। इसके अलावा यह भी अहम है कि इस पद के लिए चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति को संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होना चाहिए। इसलिए अगर कोई सांसद इसके लिए चुनाव लड़ना चाहता है तो सबसे पहले उसे संसद की सदस्यता से इस्तीफा देना होगा।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के जरिए होता है चुनाव : उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा होने के 60 दिनों के भीतर चुनाव होना जरूरी है। उपराष्ट्रपति का चुनाव निर्वाचक मंडल यानी इलेक्टोरल कॉलेज के जरिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के जरिए होता है। इसमें संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा के सांसद वोट डालते हैं।

सभी उम्‍मीदवारों को नंबर देने होते हैं : हर सदस्य का एक ही वोट होता है। वोट करने वाले व्यक्ति को अपनी पसंद के मुताबिक चुनाव में खड़े उम्मीवारों को प्राथमिकता के आधार पर नंबर देना होता है। यानी अगर दो उम्मीदवार हैं तो उसे एक और दो नंबर पर उम्मीदवार की प्राथमिकता बतानी होगी। ऐसे ही अगर तीन हैं तो उसे तीनों को प्राथमिकता के आधार पर तय करना होगा। दोनों सदनों में सदस्यों की संख्या कुल 790 (लोकसभा-545 + राज्यसभा-245) है। इस पद्धति को सिंगल वोट ट्रांसफरेबल सिस्टम कहा जाता है।

इस फॉम्‍युले से तय होता है कोटा : इसमें कुल पड़ने वाले वोटों को जोड़कर उसे दो से भाग दिया जाता है। जो अंक निकलकर आता है, उसमें एक जोड़ दिया जाता है। इस संख्या को कोटा कहा जाता है। जीतने वाले प्रत्याशी को कम-से-कम कोटा जितने वोट हासिल करना जरूरी होता है। वोट की गिनती के लिए सबसे पहले पहली प्राथमिकता के आधार वाले वोटों की गिनती होती है। अगर पहली प्राथमिकता के आधार पर कोई उम्मीदवार कोटा जितना या उससे ज्यादा वोट पा लेता है तो उसे जीता हुआ मान लिया जाता है।

इस तरह वोट होते हैं ट्रांसफर : अगर पहली प्राथमिकता में जीत के लिए जरूरी वोट नहीं मिलते तो उस स्थिति में पहली प्राथमिकता में सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार को चुनावी दौड़ से बाहर मान लिया जाता है। लेकिन तब उसे दूसरी प्राथमिकता में मिले वोटों को दूसरे उम्मीदवार के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाता है। इसके बाद देखा जाता है कि दूसरा उम्मीदवार उन ट्रांसफर हुए वोटों के आधार पर कोटे की संख्या तक पहुंचा या नहीं।

विवाद होने पर सुप्रीम कोर्ट करता है फैसला : अगर वह कोटा तक पहुंचने में सफल रहता है तो उसे विजयी मान लिया जाता है, वरना यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है, जब तक कोई एक उम्मीदवार निर्धारित कोटे को हासिल नहीं कर लेता। राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति चुनाव में किसी भी मामले के उलझने या विवाद सामने आने पर संविधान के अनुच्छेद-71 के मुताबिक, फैसले का अधिकार केवल देश की सुप्रीम कोर्ट को है।

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