
नई दिल्ली। भारतीय वायुसेना ने पूर्वी लद्दाख में चीन सीमा के करीब अपनी सामरिक और भारी एयरलिफ्ट क्षमताओं को प्रदर्शित करते हुए इतिहास रचा है। वायुसेना के चार इंजनों वाले भारी परिवहन विमान आईएल-76एमडी (जिसे गजराज के नाम से जाना जाता है) ने न्योमा एयरफील्ड में 13629 फीट की ऊंचाई पर लैंडिंग की है। गजराज की सामान ढोने की क्षमता इतनी अधिक है कि इसमें सीधे टी-72 मुख्य युद्धक टैंक को लोड करके ले जाया जा सकता है। इसके अलावा, यह एक साथ 6.5-टन क्षमता वाले 3 ट्रकों को ले जाने में सक्षम है। पूर्वी लद्दाख में सिंधु नदी के तट पर स्थित न्योमा एयरबेस, वास्तविक नियंत्रण रेखा(एलएसी) से मात्र 46 किलोमीटर दूर है। लगभग 2.7 किलोमीटर लंबे इस रनवे पर ‘गजराज’ की लैंडिंग से भारतीय सेना के लिए भारी टैंकों, उपकरणों और सैनिकों को सीधे अग्रिम मोर्चे तक पहुंचाना अब बेहद आसान हो जाएगा।



13629 फीट की ऊंचाई पर विमान संचालन कई तरह की तकनीकी और वातावरण की चुनौतियां पैदा करता है। अत्यधिक ऊँचाई पर हवा की घनत्व कम होने से विमान को ऊपर उठाने में कठिनाई होती है, जिससे लैंडिंग और टेक-आॅफ के लिए लंबे रनवे की आवश्यकता होती है। इस तरह की लैंडिंग के लिए पेलोड (वजन), ईंधन की मात्रा, तापमान और रनवे की स्थितियों का सटीक आकलन करना बेहद जरूरी होता है। न्योमा में साधारण एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड से आधुनिक पूर्ण विकसित एयरबेस बनाया गया है। सितंबर 2009 में पहली बार मध्यम परिवहन विमान एएन-32 ने यहां लैंडिंग की थी। नवंबर 2025 में वायुसेना प्रमुख ने सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान से उतरकर इसके उन्नत एयरबेस का औपचारिक उद्घाटन किया। पिछले महीने डीआरडीओ ने न्योमा के ड्रॉप जोन का उपयोग स्वदेशी हाई-अल्टीट्यूड पैराशूट के परीक्षण के लिए किया था।
1985 में भारतीय वायुसेना में शामिल किए गए आईएल-76एमडी विमान ने हर कठिन परिस्थिति में अपनी क्षमता साबित की है। सियाचिन ग्लेशियर में दशकों से लगातार रसद और आपूर्ति पहुंचाने में इसकी अहम भूमिका रही है। इसके अलावा मालदीव में पेयजल संकट के दौरान 22 टन पीने का पानी पहुंचाया। कार निकोबार में क्षतिग्रस्त रनवे पर भी सफल लैंडिंग कर राहत सामग्री पहुंचाई। अब न्योमा में हासिल की गई यह नई उपलब्धि लद्दाख सेक्टर में भारत की रणनीतिक बढ़त को और अधिक मजबूत करती है।

