
रांची। झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने दुष्कर्म एवं यौन हिंसा की पीड़िताओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए मंगलवार को एक अहम निर्णय सुनाया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि किसी भी संज्ञेय अपराध, विशेषकर यौन हिंसा के मामलों में पुलिस क्षेत्राधिकार के आधार पर प्राथमिकी दर्ज करने से इंकार नहीं कर सकती।
अब थाना प्रभारी बिना किसी देरी के जीरो प्राथमिकी दर्ज करेंगे और फिर उसे संबंधित थाने को अग्रेषित करेंगे। ऐसा न करने पर उनके खिलाफ आपराधिक एवं विभागीय कार्रवाई होगी। अदालत ने पीड़िता का मेडिकल परीक्षण और बयान दर्ज करने में किसी भी तरह की देरी से बचने के लिए भी निर्देश दिया हैअदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के निर्णय का हवाला देते हुए टू फिंगर टेस्ट को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया। यह परीक्षण पीड़िता की गरिमा और निजता का उल्लंघन है। राज्य के सभी सरकारी व निजी अस्पतालों को इस परीक्षण से बचने का सर्कुलर जारी करना होगा। इसका उल्लंघन करने पर चिकित्सकीय कदाचार का मामला बनेगा।
पीड़िताओं को दें त्वरित मुआवजा : अदालत ने कहा कि पीड़िता को अंतरिम मुआवजा प्राथमिकी दर्ज होने के 15 दिनों के भीतर देने का प्रयास किया जाए। अंतिम मुआवजा अदालत के निर्णय के 30 दिनों के भीतर पीड़िता को दिया जाएगा। मुआवजे की राशि पीड़िता की हानि और चोट के अनुरूप होगी।
कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि दुष्कर्म की घटना से जन्मे बच्चों को 12वीं कक्षा तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दी जाए। हर जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए। मेधावी छात्रों को आइआइटी, एम्स, आइआइएम जैसे संस्थानों में चयन होने पर राज्य सरकार छात्रवृत्ति प्रदान करेगी।
वन-स्टाप सेंटरों में हो सुधार : अदालत ने राज्य के 24 जिलों में चल रहे वन-स्टाप सेंटरों की स्थिति पर चिंता जताई है। अदालत ने महिला समिति गठित करने का आदेश दिया, जो इन केंद्रों का नियमित निरीक्षण करेगी। इन सेंटर में सुरक्षा, साफ-सफाई, पेयजल, रसोई, सीसीटीवी कैमरे, अग्निशमन उपकरण और स्टाफ की तैनाती सुनिश्चित की जाएगी।
रांची के नारी निकेतन (शक्ति सदन) को बिना समय सीमा के शेल्टर होम के रूप में उपयोग करने का निर्देश दिया गया। अदालत ने सभी मीडिया (प्रिंट, इलेक्ट्रानिक, इंटरनेट मीडिया) को निर्देश दिया कि वे दुष्कर्म पीड़िता के नाम या पहचान को प्रकाशित न करें।
अदालती रिकार्ड में भी पीड़िता का नाम सीलबंद कवर में रखा जाए। इसका उल्लंघन करने पर दो साल कारावास और जुमार्ने का प्रविधान किया गया है। अदालत ने कहा है कि पीड़िता का बयान लेने के लिए महिला पुलिस अधिकारी (उप-निरीक्षक या उच्च पद) दर्ज करेगी।पुलिसकर्मियों को संवेदनशीलता, मानवाधिकार और समयबद्ध जांच का प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रारंभिक जांच 15 दिनों में और अंतिम जांच दो महीने में पूरी करनी होगी। पीड़िताओं को मुफ्त एवं दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध कराया जाएगा। राज्य सरकार रोजगार या कौशल विकास प्रशिक्षण की योजना बनाएगी, जिससे पीड़िताएं आत्मनिर्भर बन सकें।
हेल्पलाइन 181 को प्राथमिकता : अदालत ने कहा कि महिला हेल्पलाइन 181 को यौन हिंसा के लिए प्राथमिक हेल्पलाइन नंबर बनाया जाए, जो आपातकालीन नंबर 112 से जुड़ा होगा। अदालत ने अपने आदेश की प्रति राज्य के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों, पुलिस अधीक्षकों, जिलाधिकारियों और विधिक सेवा प्राधिकार को भेजने का निर्देश दिया है। इस संबंध में हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई थी। अदालत ने इस पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुमित गाडोदिया और झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार (झालसा) के सुझावों को स्वीकार करते हुए उक्त निर्देश जारी किया है।
