
रांचीः झारखंड में 22 नियुक्ति परीक्षाओं को रद्द किए जाने के फैसले के बाद प्रभावित अभ्यर्थियों ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। वहीं रांची में झारखंड मंत्रालय के बाहर भी इनका प्रदर्शन जारी है। सरकार के फैसले से नौकरी गंवाने को लेकर चिंतित महिला अफसरों ने बताया कि 10 साल पहले उन्होंने परीक्षा दी और अब जाकर नौकरी मिली, लेकिन एक बार फिर से परीक्षा देने की बात हो रही है। ऐसे में वो दस साल बाद अपने बच्चों के साथ परीक्षा देने की मजबूर होगी।
झारखंड मंत्रालय के बाहर प्रदर्शन कर रहीं एक महिला अफसर ने बताया कि 10 साल पहले जब उन्होंने ये परीक्षा दी थी, तब वो सिंगल थीं। अब अगर दोबारा परीक्षा देनी पड़ी, तो उनके अपने बच्चे ही उनके प्रतिस्पर्धी (कॉम्पिटिटर) बनकर साथ बैठेंगे। यह दर्द है। जेएसएससी सीजीएल परीक्षा रद्द होने से प्रभावित हुई एक पूर्व महिला अधिकारी का, जो अब तक इसी व्यवस्था के तहत अपनी सेवाएं दे रही थीं।
महिला अभ्यर्थी ने पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि कल तक वे जिन दफ्तरों में अफसर और कर्मचारी के रूप में सरकार का काम संभाल रही थीं, आज उन्हीं इमारतों में उनकी एंट्री पर रोक लगा दी गई है। उन्होंने पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि भीड़ तंत्र के दबाव में आकर अचानक परीक्षा रद्द करना सरासर गलत है। यह कोर्ट के आदेशों की अवमानना भी है। सरकार को जल्दबाजी में कैबिनेट बैठक बुलाकर फैसला लेने के बजाय पहले अदालत का रुख करना चाहिए था और कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए थी।
प्रदर्शन पर सवाल उठाते हुए उन्होंने दावा किया कि जयपाल सिंह स्टेडियम में जुटे अधिकांश लोग वास्तविक छात्र नहीं थे, बल्कि वे (देवेंद्र नाथ महतो और अन्य नेता) राजनीतिक दलों से प्रेरित थे। उनका कहना था कि सरकार को केवल भ्रष्ट और गलत लोगों को बाहर करना चाहिए था, न कि ईमानदारी से चुने गए लोगों को हटाना चाहिए था। अब सरकार दोबारा पढ़ाई करने की बात कह रही है, लेकिन पढ़ाई की भी एक उम्र होती है, कोई पूरी जिंदगी सिर्फ पढ़ाई नहीं कर सकता।
