
धनबाद। डुमरी विधायक जयराम महतो को विनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि मिली। डॉक्टर की उपाधि मिलने के बाद मीडिया से बातचीत में जयराम महतो ने अपने बचपन के संघर्ष को याद किया। उन्होंने बताया कि पिता को बचपन में ही खो दिया था और बेहद कठिन परिस्थितियों में नाना-नानी और परिवार के दूसरे सदस्यों ने उनका पालन-पोषण किया। परिवार के लोग उन्हें अक्सर टूअर गीदर कहकर संबोधित करते थे और समझाते थे कि ऐसा काम करना जिससे परिवार का नाम खराब न हो। यही शब्द उनकी संघर्ष की कहानी का अहम हिस्सा बनकर सामने आए।पीएचडी की उपाधि मिलने के बाद जयराम महतो ने मंच से अपनी उपलब्धि की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष को याद किया, जिसने उन्हें यहां तक पहुंचाया. बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ गया था। इसके बाद नाना-नानी के घर करीब 15-16 साल तक उनका पालन-पोषण हुआ. आर्थिक हालात अच्छे नहीं थे. परिवार के बड़े-बुजुर्गों की एक ही चिंता थी- बच्चा पढ़े और जीवन में आगे बढ़े. जयराम महतो ने बताया कि परिवार के लोग उन्हें एक खास शब्द से संबोधित करते थे, टूअर गीदर अर्थात अनाथ बच्चा।उन्होंने बताया कि हमारी भाषा में कहते हैं- हाथ डोवर गीदर लगा, इसलिए कोई ऐसा काम नहीं करिया, जे नाम खराब होतो. ऐसा काम करिया, जे लोग कहतै—एगो टूअर गीदर मामा घर दैके पढ़लै, बहुत बड़ा काम कर ले।जयराम महतो के मुताबिक, टूअर का इस्तेमाल उनके इलाके में ऐसे बच्चे के लिए किया जाता है, जिसके पिता नहीं होते हैं। उन्होंने कहा कि इस शब्द का पूरा अर्थ उन्हें भी आज तक स्पष्ट रूप से मालूम नहीं है, लेकिन बचपन में परिवार के लोगों के मुंह से यह बात लगातार सुनते थे। उनके लिए यह सिर्फ संबोधन नहीं था, बल्कि जिम्मेदारी का एहसास भी था. परिवार के लोग उन्हें समझाते थे कि पिता नहीं हैं, इसलिए ऐसा कोई काम मत करना जिससे परिवार का नाम खराब हो। पढ़ाई करो और ऐसा मुकाम हासिल करो कि लोग कहें कि मामा के घर रहकर पढ़ने वाला यह बच्चा आज बड़ा काम कर रहा है।

