संयुक्त राष्ट्र। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग दोहराते हुए कहा है कि करीब 80 साल पहले हुए द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों के आधार पर आज की वैश्विक व्यवस्था को निर्धारित नहीं किया जा सकता। भारत ने चेतावनी दी कि सुरक्षा परिषद में दुनिया के मौजूदा राजनीतिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की कमी के कारण संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में गुरुवार को भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध में जीत के आधार पर हासिल विशेषाधिकार आज की परिस्थितियों में सुरक्षा परिषद की वैधता की कमी को दूर नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में सुधार की जरूरत है, ताकि संयुक्त राष्ट्र अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और प्रभावी बन सके।

द्वितीय विश्व युद्ध में भारत के योगदान का किया जिक्र

पी. हरीश ने कहा कि सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता आज भी मुख्य रूप से उन देशों के पास है, जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध का विजेता माना जाता है। उन्होंने इस संदर्भ में युद्ध के दौरान भारत के योगदान को भी रेखांकित किया।

उन्होंने बताया कि करीब 25 लाख भारतीयों ने द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था, जबकि लगभग 90 हजार भारतीय सैनिकों ने अपनी जान गंवाई थी। इसके अलावा, औपनिवेशिक नीतियों के कारण बंगाल में पड़े अकाल में 40 लाख से अधिक लोगों की मौत होने का भी उन्होंने उल्लेख किया।

हरीश ने कहा कि इतिहास के इन पहलुओं को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। उनके मुताबिक, विजेता देशों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई गई व्यवस्था में युद्ध के पीड़ितों और अन्य देशों की चिंताओं को पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाया।

सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया तेज करने की मांग

भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत स्थायी सदस्यों को दिए गए विशेष अधिकारों का इस्तेमाल सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक रोकने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने सुरक्षा परिषद सुधार से संबंधित अंतर-सरकारी वार्ताओं (आईजीएन) को आगे बढ़ाने के लिए स्पष्ट दिशा, निर्धारित समय-सीमा और बातचीत का ठोस मसौदा तैयार करने पर जोर दिया।

पाकिस्तान समेत कुछ देशों पर लगाया आरोप

हरीश ने आरोप लगाया कि इटली के नेतृत्व वाले देशों के एक समूह, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है, की प्रक्रियागत आपत्तियां सुधार संबंधी वार्ताओं के लिए मसौदा पाठ अपनाने में बाधा बन रही हैं। यह समूह ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (यूएफसी) के नाम से जाना जाता है और मसौदा पाठ स्वीकार करने से पहले व्यापक सहमति पर जोर देता है।

इस पर भारत ने कहा कि किसी भी बहुपक्षीय वार्ता को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने के लिए शुरुआती मसौदा जरूरी होता है। बातचीत शुरू होने से पहले ही सभी मुद्दों पर पूर्ण सहमति की शर्त रखना प्रक्रिया को बाधित कर सकता है।

हरीश ने जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र की अन्य प्रक्रियाओं की तरह सुरक्षा परिषद में सुधार से जुड़ी वार्ताओं को भी लिखित मसौदे के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि बातचीत ठोस परिणाम तक पहुंच सके।

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