
नई दिल्ली। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजों के बाद वैश्विक कच्चे तेल बाजार में बड़ी गिरावट देखने को मिल रही है। गुरुवार को लगातार चौथे कारोबारी सत्र में तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 94 डॉलर प्रति बैरल के नीचे फिसल गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 87 डॉलर प्रति बैरल से नीचे पहुंच गया। ईरान के साथ अमेरिका का तनाव कम होने की उम्मीद और वैश्विक आपूर्ति में सुधार के संकेतों ने तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ा दिया है।



गुरुवार को ब्रेंट क्रूड करीब 1 प्रतिशत टूटकर 93.65 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा। वहीं, अमेरिकी WTI क्रूड की कीमत 1.36 प्रतिशत गिरकर 86.92 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। इससे पहले बुधवार को भी दोनों प्रमुख बेंचमार्क में 8 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई थी। इस सप्ताह अब तक कच्चे तेल की कीमतें करीब 16 प्रतिशत तक लुढ़क चुकी हैं।
ईरान-अमेरिका तनाव कम होने की उम्मीद से दबाव
तेल बाजार में गिरावट की प्रमुख वजह पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव कम होने की संभावना को माना जा रहा है। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की बड़ी जीत के बाद निवेशकों को उम्मीद है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए ईरान के खिलाफ आक्रामक सैन्य कार्रवाई करना आसान नहीं होगा। इससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक समाधान निकलने की संभावना बढ़ी है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, खाड़ी देशों के सरकारी हलकों से जुड़े सूत्रों का मानना है कि ईरान पर बड़े सैन्य हमले की आशंका पहले के मुकाबले कम हुई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी संकेत दिए हैं कि फिलहाल अमेरिका की ओर से ईरान पर तत्काल हमले की कोई योजना नहीं है। वहीं, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी युद्ध की उपयोगिता पर सवाल उठाए हैं। इन घटनाक्रमों से तेल बाजार में पहले से मौजूद जोखिम प्रीमियम घटा है और निवेशकों ने बिकवाली तेज कर दी है।
तेल आपूर्ति में सुधार से भी कीमतों पर असर
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट की एक अन्य वजह वैश्विक आपूर्ति में सुधार है। होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल की आपूर्ति लगभग युद्ध-पूर्व स्तर के करीब पहुंचने लगी है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता को लेकर चिंताएं कम हुई हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति बहाल होने के बाद वैश्विक तेल बाजार में फिर से अतिरिक्त आपूर्ति यानी सरप्लस की स्थिति बन रही है। एक बैंक के अनुमान के मुताबिक, सितंबर में वैश्विक बाजार में प्रतिदिन करीब 11 लाख बैरल और अक्टूबर में लगभग 14 लाख बैरल अतिरिक्त तेल उपलब्ध रहा।
रुपये में लगातार पांचवें दिन मजबूती
इस बीच, भारतीय मुद्रा रुपये में भी मजबूती देखने को मिली। बुधवार को 94.64 प्रति डॉलर पर बंद होने के बाद गुरुवार को रुपया 29 पैसे की बढ़त के साथ 94.35 प्रति डॉलर पर खुला। लगातार पांच कारोबारी सत्रों से रुपये में मजबूती दर्ज की जा रही है।
लंबे समय तक गिरावट बने रहने पर संशय
हालांकि, ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा गिरावट को स्थायी मानना जल्दबाजी होगी। पश्चिम एशिया के हालात में कभी भी बदलाव आ सकता है। इसके अलावा अमेरिकी कांग्रेस की नई संरचना जनवरी से प्रभावी होगी, इसलिए तत्काल नीतिगत बदलाव की संभावना कम है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, प्रमुख तेल उपभोक्ता देशों के वाणिज्यिक भंडार पिछले 15 वर्षों के निचले स्तर के करीब हैं। अमेरिका में भी पिछले सप्ताह कच्चे तेल, पेट्रोल और डिस्टिलेट के भंडार में कमी दर्ज की गई, जबकि तेल की मांग एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।
ऐसे में फिलहाल कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव जरूर है, लेकिन आने वाले दिनों में भू-राजनीतिक घटनाक्रम, वैश्विक मांग और आपूर्ति की स्थिति ही बाजार की अगली दिशा तय करेगी।

