नई दिल्ली। पूरी दुनिया जब भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार विवाद और ऊर्जा संकट से जूझ रही है, तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर नए सिरे से विश्वास बहाली का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि आज विश्व संसाधनों की कमी से नहीं, बल्कि विश्वास की कमी से जूझ रहा है। भविष्य की सारी साझेदारियां एवं नई व्यवस्थाएं आपसी विश्वास पर टिकी होनी चाहिए। उन्होंने सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय के सिद्धांत का जिक्र करते हुए भरोसे पर आधारित अंतरराष्ट्रीय साझेदारी और वैश्विक विकास का आह्वान किया।

जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान ‘नई साझेदारियों का निर्माण और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता को पुनर्स्थापित करना’ विषय पर आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा, ‘आज का विश्व पहले से कहीं अधिक जुड़ा हुआ और एक-दूसरे पर निर्भर है। किसी भी देश की ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि अब सिर्फ उसकी अपनी सीमाओं के अंदर तय नहीं होती। लोगों की आवाजाही, डाटा, पूंजी और नई तकनीक ये सब हमें एक-दूसरे से जोड़ रहे हैं। ऐसे समय में साझेदारियों का महत्व बहुत बढ़ गया है। लेकिन साझेदारियां तभी सफल होती हैं, जब उनके बीच में विश्वास हो।’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बगल में बैठे मोदी ने कहा, ‘आज सबसे कीमती संपत्ति न कोई खनिज है, न कोई नई तकनीक और न ही कोई बाजार; बल्कि सबसे महत्वपूर्ण है आपसी विश्वास। विश्वास यह कि तकनीक और आपूर्ति शृंखला को हथियार बनाने के बजाय पूरी दुनिया के भले के लिए इस्तेमाल किया जाए। विश्वास यह कि विकास के अवसर कुछ-एक देशों तक ही सीमित न रहें। विश्वास यह कि वैश्विक संस्थान सभी देशों की आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हों।’

मोदी ने कहा कि भारत का मानना है कि साझेदारी की असली परीक्षा यह नहीं है कि हम दूसरों के लिए क्या बनाते हैं, बल्कि यह है कि हम दूसरों को अपने लिए क्या बनाने में मदद करते हैं। हमारा अनुभव बताता है कि विकास तब सबसे असरदार होता है, जब वह लोगों की उम्मीदों से जुड़ा हो। अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का भारत का विजन ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की सोच पर आधारित है।

कूटनीतिक जानकारों के मुताबिक, भारतीय प्रधानमंत्री की तरफ से हाल के दशकों में संभवत: पहली बार वैश्विक साझेदारी में भरोसे को इस कदर महत्व दिया गया है और इसके पीछे भारत के दीर्घकालिक कूटनीतिक हित भी हैं। चूंकि आज का विश्व पहले से कहीं अधिक जुड़ा हुआ और एक-दूसरे पर निर्भर है। पश्चिम एशिया विवाद उदाहरण है कि किस तरह दो-तीन देशों के आपसी संघर्ष की वजह से पूरी दुनिया में ऊर्जा व उर्वरक का संकट पैदा हो गया है।

मोदी ने पिछले सदी में दो विश्व युद्धों का उदाहरण देकर बताया कि उसके बाद वैश्विक शांति के लिए जो व्यवस्था बनाई गई उसके पीछे का कारण भरोसा ही था, जो अब खत्म हो रहा है। मोदी ने कहा, ‘कोविड महामारी ने विश्वास और एकजुटता के सारे दावों को खोखला साबित कर दिया।’ उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन का हवाला देते हुए कहा, ‘विश्वास करो, लेकिन सत्यता भी जांच लो।’

मोदी ने इस मंच से ग्लोबल साउथ का मुद्दा भी उठाया और कहा कि ग्लोबल साउथ दानदाता-प्राप्तकर्ता वाली सोच से आगे निकलकर बराबरी के साझेदार के रूप में शामिल होना चाहता है। साझेदारी को निर्भरता के बजाय सम्मान से जोड़ना होगा।

जी-7 नेताओं के साथ तस्वीर साझा की
भारत को जी-7 शिखर सम्मेलन में मेहमान देश के तौर पर आमंत्रित किया गया है। प्रधानमंत्री मोदी लगातार सातवीं बार इस शिखर सम्मेलन में शामिल हो रहे हैं। शिखर सम्मेलन की फैमिली फोटो के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को दुनिया के कई नेताओं के साथ बातचीत करते हुए भी देखा गया।

इस बारे में उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा, “आज दोपहर एवियन में जी-7 शिखर सम्मेलन की कार्यवाही शुरू होने से पहले। जी-7 नेताओं के साथ विचारों का आदान-प्रदान करना हमेशा जानकारीपूर्ण होता है। हम खुशहाली, सततता और मानव कल्याण को आगे बढ़ाने के लिए मिलकर काम करते रहेंगे।”

सुनिश्चित करें कि नाविक बिना भय के कार्य कर सकें
प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम एशिया में शांति प्रयासों का स्वागत किया, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री व्यापार बाधित होने और भारतीय नागरिकों की मौत पर दुख भी व्यक्त किया।

उन्होंने कहा, ‘होर्मुज स्ट्रेट में सामुद्रिक कारोबार में बाधा के कारण पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा है। भारत के कई नागरिकों को जान गंवानी पड़ी। सभी देशों को आपस में जोड़ने वाले नाविकों की सुरक्षा हमारा दायित्व है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि समुद्री मार्ग सुरक्षित रहें और नाविक बिना भय के अपना कार्य कर सकें।’मोदी की यह टिप्पणी ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सेना के हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद आई है।

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