पटना । कभी आर्थिक तंगी, सीमित संसाधन, साहूकारों के कर्ज और परिवार की बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच जीवन गुजारने को मजबूर ग्रामीण महिलाओं ने जब जीविका स्वयं सहायता समूह का हाथ थामा, तो उनके जीवन में बदलाव की एक नई शुरुआत हुई। छोटी-छोटी बचत से शुरू हुई यह यात्रा आज स्वरोजगार, उद्यमिता, सम्मान और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी है। जीविका समूहों ने महिलाओं को न केवल बचत और ऋण की सुविधा दी, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास, प्रशिक्षण, वित्तीय अनुशासन और अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर भी दिया। समूह के माध्यम से ऋण लेकर महिलाओं ने अपनी रुचि और स्थानीय बाजार की जरूरत के अनुसार मसाला उत्पादन, खाद्य प्रसंस्करण, आटा पिसाई और मशरूम उत्पादन जैसे उद्यम शुरू किए और आज वह सालान लाखों की आमदनी कर रही हैं।भागलपुर की नूतन देवी ने समूह से ऋण लेकर आटा-चक्की स्थापित की और बाद में मसाला उत्पादन शुरू कर अपने व्यवसाय का विस्तार किया। आज उनकी मासिक आय लगभग 20–25 हजार रुपये तक पहुंच गई है। इसी जिले की सविता देवी और नीलम देवी ने भी समूह से ऋण लेकर मसाला उत्पादन शुरू किया और अपने उत्पादों को स्थानीय बाजार तक पहुंचाकर अपनी पहचान बनाई।किशनगंज की असीना खातून की कहानी ग्रामीण उद्यमिता की बड़ी मिसाल है।उन्होंने घर से हस्तनिर्मित मसाला उत्पादन शुरू किया और धीरे-धीरे अपने उत्पादों की बिक्री आसपास के जिलों के साथ-साथ पश्चिम बंगाल तक पहुंचाई। उनके उद्यम से लगभग 40 जीविका दीदियों को रोजगार मिला और उनकी मासिक आय आज लगभग 60 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है। विभिन्न मेलों और एक्सपो में भागीदारी एवं पुरस्कार ने उनके उद्यम को नई पहचान दी है। नालंदा की बीबी तराना ने बताया कि जीविका के सहयोग और प्रशिक्षण से मसाला उत्पादन को व्यवस्थित रूप दिया गया। गुणवत्ता और शुद्धता को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने अपने उत्पादों के लिए ग्राहकों का विश्वास बनाया। आज उनका वार्षिक कारोबार लगभग 3.40 लाख रुपये से अधिक है। इसी जिले की मंजुला कुमारी ने भी जीविका से जुड़कर मशरूम उत्पादन से अपनी उद्यमिता की शुरुआत की। उन्होंने स्वयं सफलता हासिल करने के साथ-साथ अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षण देकर इस गतिविधि से जोड़ा। आगे चलकर उन्होंने खाद्य प्रसंस्करण इकाई स्थापित कर मसाला उत्पादन एवं पैकेजिंग का कार्य शुरू किया। आज उनकी आय लगभग 30–40 हजार रुपये प्रतिमाह तक पहुंच गई है। इधर, संगीता देवी ने आर्थिक कठिनाइयों और कर्ज की परेशानियों के बीच जीविका समूह से जुड़कर छोटे ऋणों का उपयोग किया और मसाला व्यवसाय शुरू किया। धीरे-धीरे उनका व्यवसाय आसपास के क्षेत्र में पहचान बनाने लगा। सरकारी योजनाओं से मिले सहयोग ने उनके व्यवसाय को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।इन सभी महिलाओं की कहानियां बताती हैं कि बिहार सरकार के इस परियोजना का असली बदलाव केवल आय बढ़ने तक सीमित नहीं है बल्कि इसके माध्यम से महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता, आत्मविश्वास, नेतृत्व और सामाजिक भागीदारी भी बढ़ी है। जो महिलाएं कभी घर की चारदीवारी तक सीमित थीं, वे आज उद्यम चला रही हैं, बाजार से जुड़ रही हैं और दूसरी महिलाओं को रोजगार और प्रशिक्षण दे रही हैं।विस्तृत समाचार के लि

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