
विवेकानंद सिंह कुशवाहा
बिहार के बहुजनों (दलित, अतिपिछड़े, पिछड़ों) एक बात कान खोल कर सुन लीजिए। 1990 के पहले के बिहार में अपनी राजनीतिक और सामाजिक स्थिति का पता लगा लीजिए ठीक से।
कांग्रेस के रहमो-करम पर जो दलित पिछड़े लोग मंत्री, मुख्यमंत्री बने भी, उनके राजनीतिक निर्णयों में उनके दखल का अध्ययन कर लीजिए एक बार, फिर 1990 के बाद के बिहार का अध्ययन करिये।
1967 में जब कर्पूरी जी ने शिक्षा मंत्री रहते मैट्रिक बोर्ड से अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म की, तो उस समय मैट्रिक पास होने वाले का कर्पूरी डिवीजन कहकर मजाक बनाया गया, जबकि वह उस समय के लिहाज से बिहार के बहुजनों के शिक्षित होने की दिशा में सूर्योदय की तरह का कदम था। 1977 में जब कर्पूरी जी ने बिहार में मुंगेरीलाल कमीशन की सिफारिश लागू की और पिछड़ों/अतिपिछड़ों के लिए आरक्षण लागू हुआ तो उनको सामंतों ने तरह-तरह की गालियां दी।
1990 में बिहार की कमान जब लालू प्रसाद यादव @laluprasadrjd जैसे लड़ाके तेवर वाले नेता के हाथ आयी। लालू जी ने कुछ नहीं किया, बस आईने का शीशा उनकी तरफ कर दिया। जो वह अब तक बहुजनों के साथ करते आ रहे थे, वही उनके साथ होने लगा।
स्थिति यह हुई कि कर्पूरी जी को खुलेआम गाली देने वाले लोग और उनके जवान बच्चे लालू यादव को ललुआ कहने से पहले अगल-बगल देख लेते थे, क्योंकि उनको पता चल गया था कि ऐसी भाषा बोलने पर उनके सुंदर से मुखड़े का नक्शा बिगड़ जायेगा।
इन सब के दौरान कुछ गलतियां लालू जी से भी हो गयीं कि उन्होंने अपने लोगों को नक्शा बिगाड़ने की शक्ति तो दी, पर वैचारिक रूप से समृद्ध नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि उनके लोगों को नक्शा बिगाड़ने की लत लग गयी और निशाना कुछ कमजोर लोग भी बनने लगे।
ऐसे में विद्रोह का स्वर वहां से भी फूटा, जिन्होंने लालू जी को 1990 में बिहार के सीएम की कुर्सी दिलायी थी। बस, फिर क्या था 1990 से पहले राज करने वाले लोगों ने इन विद्रोहियों के नेतृत्व में खड़े होने का न सिर्फ निर्णय लिया, बल्कि प्रचार-प्रसार में भी कोई कमी नहीं छोड़ी।
2005 में अंततः कामयाबी हाथ लगी। नीतीश कुमार @NitishKumar जैसे महीन बुद्धि वाले नेता के हाथ बिहार की कमान आयी। नीतीश जी जानते थे कि यदि अपने बेस को बड़ा और मजबूत न बनाया तो ये लोग गर्दनिया पासपोर्ट देते देर नहीं करेगा।
नीतीश जी ने भरपूर कोशिश की कि बिहार जातीय टसल से मुक्ति पाये। नीतीश जी ने खासकर तीन वर्गों के लिए खूब काम किया, जिनमें अतिपिछड़े, सवर्ण और अल्पसंख्यक शामिल थे। दलितों को महादलित बना कर उनकी हिस्सेदारी बढ़ाने का सार्थक प्रयास किया।
2010 के विधानसभा के परिणाम के बाद नीतीश जी को लगने लगा था कि जाति/पाती से ऊपर बिहार का हर वर्ग उनको अपना नेता मानने लगा है, लेकिन उनके इस भ्रम को टूटते देर न लगी, जब 2014 में उन्होंने अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया। उनके साथ मुख्य रूप से तीन ही थे लव-कुश, अतिपिछड़े और कुछ महादलित।
नीतीश जी समझ गये कि सवर्ण उनको तभी वोट करेगा, जब वह भाजपा के साथ रहेंगे या उनको लगे कि लालू राज लौट न आये। यही कारण है कि 2024 में भी नीतीश जी के चुनावी भाषण में लालू जी और उनके नौ बच्चे, जंगलराज आदि शामिल रहा। नीतीश जी किसी दुर्भावना में लालू जी को लेकर ऐसा नहीं बोलते, बल्कि सवर्णों के बीच लालू जी को कैश करते हैं।
लालू जी अगर बिहार के मुख्यमंत्री न बने होते तो आज नीतीश जी भी बिहार के लांगेस्ट सर्विंग मुख्यमंत्री न होते। बिहार को बिहार के बाहर जातिवाद के लिए सबसे ज्यादा बदनाम जिन लोगों ने किया, उन लोगों से बड़ा जातिवादी आपको हैलोजन लाइट से खोजे नहीं मिलेगा।
अब जब लालू जी की राजनीतिक वापसी संभव नहीं है, तब उनके बनाये मजबूत किले एमवाई को विखंडित करने के लिए तमाम अढाईया चाल चले जा रहे हैं। पुराने रिश्तों की याद दिलाई जा रही है। उनको मुसलमानों से मतलब नहीं है, उनकी नजर 17 परसेंट वोट पर है। कैंपेन मैनेजर से नेता बने सज्जन जदयू को चार सीट पर भेजने का दावा कर रहे हैं। भाजपा के कोर समर्थक बिहार में एनडीए की 10 सीटों पर हार का ठीकरा मुरैठा मैन और जदयू के कार्यकर्ताओं पर फोड़ना चाहते हैं, जबकि यूपी में आधे से अधिक सीटों पर हार के लिए योगी की जगह अमित शाह और उनका टिकट बन्टवारा जिम्मेदार हो जाता है। लंदन की जमी जमाई नौकरी छोड़ कर लोग बिहार बदलने आये हैं। आपके वोट से चुना हुआ एक सांसद सीधे कह रहा है कि यादव और मुस्लिम का काम नहीं करूंगा और कुशवाहा समाज की सोच विकृत है। क्या लग रहा है आपको, इतना सबकुछ ऐसे ही हो रहा है? जिनके सत्ताशीन बाप-दादाओं को आजादी के बाद चार दशक तक आपकी चिंता नहीं रही, उनके बच्चे आपकी तक़दीर बदलने आये हैं? वह भी आपके अपनों को चोर, बेईमान, शैतान बता कर? क्या आप उनकी बात मान लेंगे? क्या आप इतने भोले हैं?
