
नई दिल्ली । कश्मीर घाटी के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले के बाद, जब भारत ने पीओके और पाकिस्तान में घुसकर आतंकी अड्डों को तबाह किया तो आतंक का पनाहगार पड़ोसी मुल्क बौखला गया। उसने सीमा पर फायरिंग शुरू कर दी। लेकिन, हमारी जांबाज सेना ने उसे मुंहतोड़ जवाब दिया। वो हमारे बहादुर सैनिक ही हैं, जिनकी बदौलत हम अपने घरों में चैन की नींद सो पाते हैं। बहादुरी की ऐसी ही कहानी है कैप्टन यशिका हतवाल त्यागी की, जिन्होंने कारगिल युद्ध के दौरान बेमिसाल साहस दिखाया।
1999 की गर्मियों में, जब लद्दाख के ऊंचाई वाले इलाकों में कारगिल का युद्ध चल रहा था, कैप्टन यशिका त्यागी दो मोर्चों पर लड़ रही थीं। एक- सीमा पर और एक अपने भीतर। कैप्टन यशिका उस समय गर्भवती थीं और इसके बावजूद, उन्होंने अपने सैनिक होने का कर्तव्य निभाया। 51 वर्षीय कैप्टन यशिका अब रिटायर हो चुकी हैं, लेकिन कारगिल युद्ध के दौरान उनकी हिम्मत की गाथा आज भी सुनाई जाती है।
सैनिक परिवार से आने वालीं यशिका त्यागी ने 1994 में चेन्नई की ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में ज्वाइन किया। कारगिल युद्ध के दौरान, उन्होंने राशन सामग्री और दूसरी सहायता में योगदान दिया। रिटायर होने के बाद उन्होंने रक्षा मंत्रालय के एक प्रोजेक्ट के डायरेक्टर के रूप में कार्य किया और इस समय वह एक प्रेरक वक्ता हैं।
सशस्त्र बलों से उनका पारिवारिक नाता था। देहरादून में एक सैन्य परिवार में जन्मीं यशिका सिर्फ सात साल की थीं, जब उनके कर्नल पिता और 1962, 1965 और 1971 की जंग में अपना योगदान देने के बाद गुजर गए। उस समय यशिका उन बातों और हालात को पूरी तरह से समझ भी नहीं पाईं क्योंकि उनके पिता का शरीर सेना के ट्रक में मालाओं से सजाकर लाया गया था।
7 साल की उम्र में वर्दी पहनने का लक्ष्य
हालांकि, साथी सैन्य अधिकारियों की तरफ से उनके परिवार को जो सम्मान और सपोर्ट मिला, उसने उनके दिल पर एक गहरा असर डाला। यही वो पल था, जिसने उनके अंदर एक दिन खुद वर्दी पहनने की इच्छा का बीज बो दिया। उनकी परवरिश मां ने की और अपने परिवार को सपोर्ट करने के उन्होंने लिए पढ़ाना शुरू किया। अनुशासन वाले माहौल में पली बढ़ीं यशिका अब पढ़ाई के महत्व को भी समझने लगी थीं।
