नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को कहा कि भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष भारत के लिए मात्र ऐतिहासिक वस्तुएं या संग्रहालय की कलाकृतियां नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की जीवंत, पवित्र और अटूट धरोहर हैं। बुद्ध का ज्ञान और मार्ग केवल भारत का नहीं, बल्कि पूरी मानवता का साझा प्रकाश है।

प्रधानमंत्री ने शनिवार को यहां राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर में भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र पिपराहवा अवशेषों की भव्य अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। प्रदर्शनी का शीर्षक ‘द लाइट एंड द लोटस: रेलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन’ रखा गया है, जिसमें 1898 में खोजे गए बुद्धकालीन अवशेषों और कलाकृतियों को एक सदी से अधिक समय बाद पहली बार वैश्विक मंच पर इतने विस्तृत और भव्य स्वरूप में प्रदर्शित किया गया। प्रधानमंत्री ने संबोधन की शुरुआत में थाईलैंड, वियतनाम, मंगोलिया, रूस, लंका, नेपाल, जापान और अन्य देशों से आए प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए कहा कि 125 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद बुद्ध की पवित्र निशानियां भारत की धरती पर लौट आई हैं। इन अवशेषों की वापसी भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता की पुनर्स्थापना का प्रतीक है, जो यह दर्शाती है कि औपनिवेशिक काल में भारत से बाहर ले जाई गई हमारी विरासत को अब संरक्षित सम्मान के साथ वापस लाया जा रहा है।

प्रधानमंत्री ने राय पिथौरा को देश के गौरवशाली अतीत और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का संगम स्थल बताते हुए कहा कि बुद्ध के अवशेषों की उपस्थिति किसी भी स्थल और वहां उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को धन्य कर देती है। उन्होंने गोदरेज समूह का विशेष आभार व्यक्त किया, जिन्होंने इन अवशेषों की सार्वजनिक नीलामी को रोकने और भारत में उनकी वापसी सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रधानमंत्री ने कहा कि गुलामी केवल राजनीतिक या आर्थिक परतों में नहीं होती, बल्कि वह सभ्यताओं की स्मृतियों और विरासत को भी मिटा देती है। औपनिवेशिक काल में पिपराहवा के अवशेषों को यह समझकर देश से बाहर ले जाया गया कि वे पुरानी, निष्प्राण वस्तुएं हैं, जबकि भारत के लिए वे पूज्य हैं, पवित्र हैं, और बुद्ध के जीवन-दर्शन का साक्षात प्रतीक हैं। जिन लोगों ने इन्हें भारत से बाहर ले जाया और उनके वंशजों ने इन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने और नीलाम करने का प्रयास किया, उनके लिए ये केवल संग्रह की वस्तुएं थीं लेकिन भारत ने यह स्पष्ट किया कि इनकी सार्वजनिक नीलामी की अनुमति नहीं दी जाएगी। भारत इन अवशेषों का संरक्षक भी है और बुद्ध परंपरा का जीवंत संवाहक भी हैं।

मोदी ने कहा थाईलैंड में एक महीने से भी कम समय में 40 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने इन अवशेषों के दर्शन किए। वियतनाम में प्रदर्शनी का समय श्रद्धालुओं की मांग पर बढ़ाना पड़ा, जहां नौ शहरों में लगभग 1.75 करोड़ लोगों ने इन्हें श्रद्धांजलि दी। मंगोलिया में हजारों लोग गंडन मठ के बाहर घंटों कतार में खड़े रहे और अनेक श्रद्धालु भारतीय प्रतिनिधियों को छूना चाहते थे, क्योंकि वे बुद्ध की भूमि से आए थे। रूस के काल्मिकिया क्षेत्र में एक सप्ताह में 1.5 लाख से अधिक लोगों ने दर्शन किए, जो वहां की आधी से अधिक आबादी के बराबर है। इन आयोजनों में आम नागरिकों से लेकर राष्ट्राध्यक्षों तक की एक जैसी श्रद्धा दिखाती है कि भगवान बुद्ध सबके हैं और सभी को जोड़ते हैं।

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