
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को कहा कि निस्वार्थ सेवा की भावना और अनुशासन का पाठ ही संघ की असली ताकत है और इसके असंख्य स्वयंसेवकों के हर कार्य में ‘राष्ट्र प्रथम’ को प्राथमिकता दी जाती है।
प्रधानमंत्री ने रेडियो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 125वें संस्करण में स्वदेशी अपनाने पर एक बार फिर जोर दिया और लोगों से दो अक्टूबर को गांधी जयंती पर खादी की कोई वस्तु खरीदने का आग्रह किया। मोदी ने यह भी कहा कि सरकार ‘छठ महापर्व’ को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल कराने के लिए प्रयास कर रही है। उन्होंने आरएसएस की सराहना करते हुए कहा, “अब से कुछ ही दिन बाद हम विजयादशमी मनाएंगे। इस बार विजयादशमी एक और कारण से और भी खास है। इस दिन, आरएसएस अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे करेगा।”
प्रधानमंत्री ने कहा कि यह सौ साल पुरानी यात्रा न केवल उल्लेखनीय बल्कि प्रेरणादायक भी है। उन्होंने कहा, “सौ साल पहले, जब आरएसएस की स्थापना हुई थी, तब हमारा देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। इस सदियों पुरानी गुलामी ने हमारे आत्मविश्वास और स्वाभिमान पर गहरा घाव किया था।” प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के लोगों में हीन भावना पनपने लगी थी। मोदी ने कहा, “इसलिए, देश की आज़ादी के साथ-साथ, यह भी जरूरी था कि देश वैचारिक गुलामी से मुक्त हो।” उन्होंने कहा कि के बी हेडगेवार ने इसी उद्देश्य से 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का गठन किया था।
मोदी ने कहा, “उनके बाद, गुरु गोलवलकर जी ने राष्ट्र सेवा के इस महायज्ञ को आगे बढ़ाया।” उन्होंने कहा, “निःस्वार्थ सेवा की भावना और अनुशासन का पाठ, यही संघ की असली ताकत है।” प्रधानमंत्री ने कहा कि आरएसएस पिछले 100 वर्षों से बिना रुके, बिना थके, राष्ट्र की सेवा में अथक परिश्रम कर रहा है। मोदी ने कहा, “यही कारण है कि जब कोई प्राकृतिक आपदा आती है, तो आरएसएस के स्वयंसेवक सबसे पहले वहां पहुंचते हैं। आरएसएस के असंख्य स्वयंसेवकों के हर कार्य में ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना हमेशा सर्वोपरि होती है।”
