चाईबासा । चाईबासा में शनिवार को आदिवासी उरांव समाज द्वारा ज्येष्ठ जतरा महापर्व पूरे उत्साह और पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया गया। सातों अखाड़ों में आयोजित इस पर्व में समाज के लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। वैशाख पूर्णिमा के बाद पहले ज्येष्ठ में मनाया जाने वाला यह पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उरांव समाज के गौरवशाली इतिहास और वीरांगनाओं के साहस की जीवंत स्मृति माना जाता है।

इस अवसर पर समाज के बुजुर्गों और प्रबुद्धजनों ने रोहतासगढ़ के ऐतिहासिक गौरव का स्मरण किया। समाज के लोगों की ओर से बताया गया कि प्राचीन काल में यह क्षेत्र उरांव समाज का समृद्ध और स्वतंत्र राज्य था, जहां उरगन ठाकुर का शासन था। राज्य की समृद्धि से प्रभावित होकर मुगलों ने कई बार आक्रमण किया। एक बार सरहुल पर्व के दौरान, जब पुरुष उत्सव में व्यस्त थे, तब मुगलों ने हमला कर दिया।

इस संकट की घड़ी में राजा की पुत्री सिनगी दाई और सेनापति की पुत्री कैली दाई ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। उन्होंने महिलाओं को संगठित कर पुरुषों का वेश धारण किया और युद्धभूमि में उतरकर मुगलों का सामना किया। अपनी रणनीति और वीरता के बल पर उन्होंने दुश्मनों को तीन बार पराजित किया। यह ऐतिहासिक गाथा आज भी उरांव समाज की अस्मिता और गर्व का प्रतीक बनी हुई है।

स्थानीय लोगों ने बताया कि इसी विजय की स्मृति में नीले झंडे पर तीन सफेद लकीरें अंकित की जाती हैं, जो तीन विजयों का प्रतीक हैं। समाज में यह परंपरा आज भी जीवित है और कई लोग अपनी पहचान एवं इतिहास को सहेजने के लिए शरीर पर तीन लकीरों का गोदना भी बनवाते हैं।

इस पर्व की शुरुआत 01 मई को जतरा जागरण के साथ हुई थी, जिसमें युवतियों ने खेतों से पवित्र मिट्टी लाकर अखाड़ों को सजाया और रातभर पारंपरिक गीत-संगीत व नृत्य का आयोजन हुआ। शनिवार को मुख्य अनुष्ठान के तहत पूर्व बान टोला के पाहन फागु खलखो ने दुर्गा कुजूर और मंगरू टोप्पो के सहयोग से विधिवत पूजा-अर्चना संपन्न कराई। इस दौरान समाज की सुख-समृद्धि और पूर्वजों के आशीर्वाद की कामना की गई।

कार्यक्रम में समाज के मुखिया लालू कुजूर, राजेन्द्र कच्छप, शंभू टोप्पो, सीताराम मुंडा, चमरू लकड़ा, रवि तिर्की, बिरसा लकड़ा, लखन टोप्पो, बुधराम कोया, मथुरा कोया, कर्मा कुजूर, बंधन कुजूर सहित बड़ी संख्या में महिला एवं पुरुष श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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