रांची। हाई कोर्ट के जस्टिस आर मुखोपाध्याय की अदालत ने झामुमो नेता निर्मल महतो हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहे नरेंद्र सिंह दीक्षित की समय-पूर्व रिहाई (प्रीमैच्योर रिलीज) से संबंधित राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के निर्णय को निरस्त कर दिया है। अदालत ने बोर्ड को निर्देश दिया है कि वह राज्य सरकार की 26 मई 2011 की समय-पूर्व रिहाई नीति के प्रविधानों के अनुरूप मामले पर नए सिरे से विचार कर तीन महीने के भीतर निर्णय ले। अदालत ने नरेंद्र सिंह दीक्षित की याचिका स्वीकार करते हुए यह निर्देश दिया।

प्रार्थी ने 28 मार्च 2025 को राज्य सजा समीक्षा बोर्ड द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी समय-पूर्व रिहाई के आवेदन को खारिज कर दिया गया था। नरेंद्र सिंह दीक्षित हत्या और आर्म्स एक्ट के मामले में सजायाफ्ता है। उसने वास्तविक रूप से लगभग 23 वर्ष की सजा काट ली है, जबकि छूट (रिमिशन) सहित वह कुल लगभग 29 वर्ष की सजा पूरी कर चुका है। उसकी सजा को वर्ष 2017 में झारखंड हाई कोर्ट ने बरकरार रखा था। इसके बाद जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि समय-पूर्व रिहाई की नीति के तहत दो महीने के भीतर उसके मामले पर विचार किया जाए। इसके बाद राज्य सजा समीक्षा बोर्ड ने यह कहते हुए उसकी अर्जी अस्वीकार कर दी थी कि उसने राजनीतिक कारणों से एक लोकप्रिय जनप्रतिनिधि की सुनियोजित हत्या की थी और उसकी रिहाई से समाज में गलत संदेश जाएगा।

बोर्ड ने नीति के जरूरी पहलुओं की अनदेखी की: सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि सजा समीक्षा बोर्ड ने प्रोबेशन अधिकारी की अनुकूल रिपोर्ट पर समुचित विचार नहीं किया। साथ ही, 26 मई 2011 की सरकारी नीति में निर्धारित अनिवार्य मानकों का भी सही ढंग से पालन नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि समय-पूर्व रिहाई पर निर्णय लेते समय बोर्ड को केवल अपराध की प्रकृति ही नहीं, बल्कि यह भी देखना होता है कि अपराध का समाज पर कितना व्यापक प्रभाव पड़ा, भविष्य में दोषी के दोबारा अपराध करने की कितनी संभावना है, उसे आगे जेल में रखना कितना आवश्यक है तथा उसकी सामाजिक परिस्थितियां क्या हैं।

जस्टिस आर मुखोपाध्याय ने कहा कि बोर्ड ने दोषी द्वारा लंबी अवधि तक जेल में बिताए गए समय और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों की उपेक्षा करते हुए केवल हत्या के राजनीतिक पहलू को अत्यधिक महत्व दिया, जो नीति के अनुरूप नहीं है। अदालत ने राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के 28 मार्च 2025 के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि 26 मई 2011 की नीति के अनुरूप तीन महीने में अंतिम निर्णय लिया जाए।

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