
यरूशलम/बेरूत | मध्य-पूर्व में शांति की उम्मीदों और युद्ध की हकीकत के बीच की खाई गहरी होती जा रही है। एक तरफ इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि युद्धविराम की शर्तों पर चर्चा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इजरायल ने लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ अपने सैन्य अभियानों को और तेज कर दिया है। IDF की कार्रवाई: 24 घंटे में 200 हमलेइजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) ने आधिकारिक बयान जारी कर बताया है कि पिछले 24 घंटों के भीतर लेबनान में हिजबुल्लाह के 200 से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया गया है।वायु और थल सेना का तालमेल: इजरायली वायुसेना दक्षिणी लेबनान में सक्रिय अपनी जमीनी सेना (Ground Troops) को कवर देने के लिए लगातार हवाई हमले कर रही है।उद्देश्य: इजरायल का दावा है कि वह उन रॉकेट लॉन्चरों को नष्ट कर रहा है जिनका उपयोग इजरायली नागरिक क्षेत्रों पर हमले के लिए किया जाता है।लेबनान में मानवीय संकट: मौत का आंकड़ा बढ़ालेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, ताज़ा हमलों में 6 लोगों की मौत हुई है और कई घायल हुए हैं। हालांकि, बुधवार को हुए बड़े पैमाने के हमलों की स्थिति और भी भयावह थी, जिसमें 350 से अधिक लोग मारे गए और 1200 से ज्यादा घायल हुए। लेबनान के उत्तरी सीमावर्ती इलाकों (गैलिली क्षेत्र) में अभी भी घुसपैठ की चेतावनियां और साइरन गूंज रहे हैं।युद्धविराम का दायरा: विवाद का मुख्य केंद्रवर्तमान कूटनीति में सबसे बड़ा गतिरोध ‘युद्धविराम के दायरे’ को लेकर है:ईरान का दावा: तेहरान का कहना है कि मंगलवार को अमेरिका के साथ तय हुआ ‘दो हफ्ते का सशर्त युद्धविराम’ लेबनान पर भी लागू होता है।अमेरिका और इजरायल का रुख: दोनों देशों ने ईरान के इस दावे को खारिज कर दिया है। उनका मानना है कि यह समझौता केवल अमेरिका-ईरान के सीधे संघर्ष को रोकने के लिए है, न कि हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायल की कार्रवाई को रोकने के लिए।फ्रांस की अपील: राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाते हुए कहा है कि इस युद्धविराम का सम्मान होना चाहिए और इसका विस्तार लेबनान तक किया जाना अनिवार्य है।विश्लेषणात्मक पहलू: वार्ता की मेज पर पड़ने वाला असरइस स्थिति का विश्लेषण करें तो तीन प्रमुख बातें उभरकर सामने आती हैं:प्रॉक्सि वार (Proxy War) का दबाव: इजरायल लेबनान में हिजबुल्लाह को कमजोर करके ईरान की ‘बार्गेनिंग पावर’ (सौदेबाजी की शक्ति) को कम करना चाहता है। वह संदेश दे रहा है कि इस्लामाबाद में हो रही बातचीत का मतलब यह नहीं है कि उसके क्षेत्रीय खतरों (हिजबुल्लाह) को छूट मिल जाएगी।ईरान की कूटनीतिक चुनौती: ईरान के लिए यह मुश्किल स्थिति है। यदि वह लेबनान में इजरायली हमलों को नहीं रुकवा पाता, तो क्षेत्रीय स्तर पर उसके समर्थकों (Axis of Resistance) के बीच उसकी साख को धक्का लग सकता है।पाकिस्तान की भूमिका का महत्व: ऐसे तनावपूर्ण माहौल में पाकिस्तान की मध्यस्थता और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। इस्लामाबाद वार्ता की सफलता इस बात पर टिकी है कि क्या अमेरिका इजरायल को संयम बरतने के लिए राजी कर पाता है।ये भी पढ़ें – अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार
