
नई दिल्ली । भारतीय सेना के प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी ने हाल ही में एक पॉडकास्ट में अपने अनुभवों और विचारों को साझा किया। इस दौरान उन्होंने सैन्य निर्णयों में नैतिकता, ऑपरेशन सिंदूर, आस्था और व्यक्तिगत जीवन के प्रभाव जैसे अहम मुद्दों पर खुलकर बात की। आईआईएमयूएन के पॉडकास्ट के एक एपिसोड में भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने उन प्रभावों के बारे में बात की, जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में उनके नेतृत्व को आकार दिया है। ऋषभ शाह द्वारा होस्ट किया जाने वाला यह पॉडकास्ट सार्वजनिक हस्तियों के जीवन के उन शुरुआती अनुभवों को सामने लाने के लिए जाना जाता है, जिन्होंने उनके जीवन का आकार दिया है। जनरल द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान लिए गए निर्णयों पर चर्चा करते हुए बताया कि सेना केवल रणनीति के आधार पर ही नहीं, बल्कि मानवीय और नैतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर भी कार्य करती है। उन्होंने एक महत्वपूर्ण उदाहरण साझा करते हुए कहा कि ऑपरेशन के दौरान लक्ष्य को नष्ट करने के लिए समय (टाइमिंग) पूरी तरह उनके नियंत्रण में था, लेकिन उन्होंने एक खास समय पर हमला नहीं करने का फैसला लिया।जब उनसे पूछा गया कि क्या ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उन्होंने भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों पर विचार किया था, तो जनरल द्विवेदी ने बताया, “जब हमें इन लक्ष्यों को नष्ट करना था, तो समय दो बजे, चार बजे यानी कभी भी हो सकता था। लेकिन हमने यह सुनिश्चित किया कि जब आतंकवादी शिविर में दूसरी तरफ के लोग अपनी नमाज अदा कर रहे हों, तो हम उस समय कोई कार्रवाई न करें; क्योंकि ‘सबका मालिक एक है’। इसीलिए हमने ऐसा समय चुना, जब हमें पता था कि वे नमाज नहीं पढ़ रहे होंगे।”यह बयान दर्शाता है कि युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी भारतीय सेना आस्था और मानवीय संवेदनाओं का सम्मान करती है। यह नेतृत्व का वह पक्ष है, जिसमें शक्ति और संयम दोनों साथ चलते हैं।पॉडकास्ट में जनरल द्विवेदी ने अपने निजी जीवन के भी उन पहलुओं पर प्रकाश डाला, जिन्होंने उनके नेतृत्व को आकार दिया। उन्होंने विशेष रूप से अपनी बेटियों का जिक्र किया।इस सवाल का जवाब देते हुए कि उनकी बेटियां उनके जीवन में ऐसा क्या लाती हैं जो उनकी पत्नी से अलग है, जनरल द्विवेदी ने कहा, “मेरी बेटियों ने मुझे सिखाया कि आपको किसी से बातचीत करने के लिए अपने स्तर से नीचे आना पड़ता है। आप हमेशा छह फीट ऊंचे नहीं रह सकते।” उनकी यह बात एक ऐसे नेतृत्व दृष्टिकोण को दर्शाती है जिसमें पद और अधिकार से ज्यादा मानवीय जुड़ाव को महत्व दिया जाता है।जनरल द्विवेदी ने बताया कि उनकी बेटियां उन्हें भारतीय सेना में सामाजिक और कार्यस्थल से जुड़े बदलावों के लिए प्रेरित करती हैं।इन सीखों को भारतीय सेना के भीतर हो रहे व्यापक बदलावों से जोड़ते हुए, उन्होंने आगे कहा, “सामाजिक स्थिति को कैसे बदला जाए? भारतीय सेना के भीतर काम करने के इन तौर-तरीकों को कैसे बदला जाए? वे हमेशा इस मामले में मेरा मार्गदर्शन करती हैं और वे मुझे जो कुछ भी बताती हैं, मैं उसे हमेशा लागू करता हूं, क्योंकि मेरे द्वारा तय किए गए सभी नियम ‘लिंग-तटस्थ’ होने चाहिए। इसलिए वे मेरी मार्गदर्शक हैं; वे हमेशा मुझे बताती हैं कि इन चीज़ों को किस तरह से आगे बढ़ाया जाए।”जनरल उपेंद्र द्विवेदी के इस इंटरव्यू ने यह स्पष्ट किया कि एक सफल सैन्य नेता केवल रणनीतिक कौशल से नहीं, बल्कि नैतिकता, संवेदनशीलता और व्यक्तिगत अनुभवों से भी बनता है। चाहे वह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान लिया गया संयमित निर्णय हो या फिर अपनी बेटियों से मिली सीख- उनकी सोच एक संतुलित और आधुनिक नेतृत्व का उदाहरण प्रस्तुत करती है।
