नई दिल्ली। झारखंड आंदोलन के प्रणेता और जल-जंगल-जमीन से जुड़े मुद्दों पर आजीवन सघर्ष करने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक एवं पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को मंगलवार की शाम को राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के हाथों यह सम्मान ग्रहण किया। व्हीलचेयर पर समारोह में पहुंचीं रूपी सोरेन के सम्मान में राष्ट्रपति स्वयं मंच से उतरकर उनके पास गईं और पद्म भूषण प्रदान किया। इस भावुक क्षण ने समारोह में मौजूद लोगों को भी भावुक कर दिया। शिबू सोरेन का नाम झारखंड के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में एक ऐसे नायक के रूप में दर्ज है, जिन्होंने आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन के अधिकार और पृथक झारखंड राज्य की मांग को जनआंदोलन का स्वरूप दिया। इसी कारण उन्हें सम्मानपूर्वक ह्यदिशोम गुरुह्ण और गुरुजी के नाम से जाना जाता है। शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को तत्कालीन बिहार के रामगढ़ (अब झारखंड) जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन सोरेन महाजनी शोषण के खिलाफ आवाज उठाते थे। इसी संघर्ष के दौरान उनकी हत्या कर दी गई। पिता की मौत ने युवा शिबू सोरेन के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा, और यहीं से उनके जीवन का रास्ता तय हो गया। 70 के दशक में उन्होंने संथाल परगना और उत्तरी छोटानागपुर क्षेत्र में महाजनी प्रथा, भूमि हड़पने और आदिवासियों के शोषण के खिलाफ आंदोलन शुरू किया।धानकटनी आंदोलन के जरिए उन्होंने आदिवासी किसानों को उनकी जमीन वापस दिलाने की मुहिम चलाई। इसी दौरान टुंडी क्षेत्र में उन्होंने रात्रि पाठशालाओं का संचालन किया, जहां लोगों को शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया जाता था। यहीं से लोग उन्हें गुरुजी कहने लगे। वर्ष 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के गठन के साथ उन्होंने पृथक झारखंड राज्य की लड़ाई को संगठित राजनीतिक दिशा दी। अगले लगभग तीन दशकों तक वे इस आंदोलन का सबसे प्रमुख चेहरा बने रहे।अंतत: 15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना, जिसे उनके लंबे संघर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है। शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। वह कई बार दुमका लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए और केंद्र सरकार में कोयला मंत्री भी रहे। हालांकि, उनकी सबसे बड़ी पहचान सत्ता नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आवाज के रूप में रही। उनकी राजनीतिक शैली भी अलग थी। बड़े-बड़े भाषणों की बजाय वे सीधे लोगों से संवाद करने में विश्वास रखते थे। गांवों की बैठकों, जनसभाओं और आंदोलनों के जरिए उन्होंने एक ऐसा जनाधार तैयार किया, जो कई दशकों तक कायम रहा।

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