
पटना। इंडी अलायंस में शामिल पार्टियों में सबसे बढ़िया परफार्मेंस सीपीआई (एमएल) का रहा है, जबकि सबसे खराब परफार्मेंस बिहार में राजद का रहा है। सीपीआई तो शून्य पर आउट हो गई। कांग्रेस ने पिछले मुकाबले स्थिति सुधारी है, लेकिन उसे उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर एनडीए के घटक दलों में सबसे बढ़िया परफार्मेंस लोक जनशक्ति पार्टी (आर) का रहा।
जेडीयू का स्ट्राइक रेट 75 प्रतिशत : एनडीए की बात करें तो भाजपा 17 सीटों पर, जेडीयू 16, एलजेपीआर पांच, हम (से) और आरएलएम एक-एक सीट पर लड़े थे। जेडीयू ने 16 में 12 सीटें जीतीं। यानी उसकी जीत का स्ट्राइक रेट 75 प्रतिशत रहा। भाजपा ने 17 में 12 सीटों पर जीत दर्ज की। यानी उसका स्ट्राइक रेट जेडीयू से भी कम रहा। जीतन राम मांझी की पार्टी हम (से) को सिर्फ एक सीट गया की मिली थी और वहां से खुद जीतन राम मांझी ने चुनाव लड़ कर जीत हासिल की। महज एक सीट पर लड़ कर आरएलएम के उपेंद्र कुशवाहा कामयाब नहीं हो पाए। अलबत्ता चिराग पासवान के नेतृत्व वाली एलजेपीआर ने अपने कोटे की पांच सीटों पर लड़ कर सभी सीटें निकाल लीं। यानी एलजेपीआर और हम का स्ट्राइक रेट सौ फीसद रहा।
इंडिया ब्लॉक को कुल नौ सीटों पर कामयाबी मिली है। इसमें तीन सीटों पर चुनाव लड़ने वाली सीपीआई (एमएल) का स्ट्राइक रेट सबसे बढ़िया रहा है। तीन में दो सीटें माले के खाते में गईं। माले की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने आरा सीट पर दो बार से चुनाव जीत रहे भाजपा के आरके सिंह को परास्त कर दिया। कांग्रेस नौ सीटों पर लड़ी, लेकिन उसे तीन सीटों से ही संतोष करना पड़ा। हालांकि पिछले चुनाव से इस बार उसकी सफलता में सुधार हुआ। किशनगंज, कटिहार और सासाराम की सीटें कांग्रेस के खाते में गईं। स्ट्राइक रेट तो यह 33 प्रतिशत होता है।
राजद ने 23 पर लड़कर चार सीटें जीतीं
आरजेडी ने 40 में आधे से अधिक यानी 26 सीटें अपने पास रखी थीं। बाद में वीआईपी के मुकेश सहनी को लालू ने इंडिया ब्लॉक में शामिल कर उन्हें तीन सीटें दे दी। यानी आरजेडी ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ा। नतीजे में सिर्फ चार सीटें आरजेडी की झोली में आईं, जो स्ट्राइक रेट में 15 प्रतिशत के करीब है। आरजेडी से तो बेहतर परफार्मेंस कांग्रेस और सीपीआई (एमएल) का रहा। आरजेडी ने पूरी कोशिश की, लेकिन पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव अपनी एक बेटी रोहिणी आचार्य को सारण सीट से जीत दिलाने में नाकाम रहे। रोहिणी लालू की वही बेटी हैं, जिन्होंने अपनी किडनी देकर पिता को जीवन दान दिया है।
पप्पू यादव ने कर दिया कमाल
आरजेडी ने लोकसभा की 23 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। उसे सिर्फ चार सीटों पर कामयाबी मिली। टिकट बंटवारे की कमान आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के हाथ थी। टिकट बंटवारे में उनकी मनमानी का आलम यह था कि पूर्णिया सीट कांग्रेस मांग रही थी, जहां से पप्पू यादव को पार्टी उम्मीदवार बनाना चाहती थी। पप्पू ने कांग्रेस से टिकट के आश्वासन पर अपनी जन अधिकार पार्टी का कांग्रेस में विलय भी कर दिया था। लालू ने उस सीट पर जेडीयू छोड़ आरजेडी में शामिल हुईं विधायक बीमा भारती को उम्मीदवार बना दिया। चुनावी लड़ाई ने रफ्तार पकड़ी तो आरजेडी को अपने उम्मीदवार की हार का भय सताने लगा। तेजस्वी यादव ने तब पप्पू को परास्त करने के लिए अपने समर्थकों से सार्वजनिक तौर पर हास्यास्पद अपील कर दी कि आरजेडी को वोट नहीं कर सकते तो एनडीए को ही जिता दें। इसके बावजूद पप्पू बतौर निर्दलीय चुनाव जीत गए।
