
पटना। पटना हाई कोर्ट ने 1996 के चर्चित जहानाबाद (अब अरवल) नरसंहार मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ट्रायल अदालत के 3 अप्रैल 2023 के उस फैसले को खारिज कर दिया है, जिसके तहत 13 अभियुक्तों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। न्यायाधीश राजीव रंजन प्रसाद और न्यायाधीश कुमार मनीष की खंडपीठ ने सभी अपीलकर्ताओ को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। यह घटना 8 अगस्त 1996 की रात की है, जब करपी थाना क्षेत्र के केयार आहर के पास पानी की सिंचाई के विवाद को लेकर 30-40 अज्ञात उग्रवादियों ने एक झोपड़ी पर हमला कर दिया था।
इस खूनी संघर्ष में चार लोगों—भरत सिंह, मंगेतर सिंह, राम निवास सिंह और नवलेश सिंह की गोली लगने से मौत हो गई थी, जबकि प्रमोद कुमार समेत अन्य घायल हो गए थे। ट्रायल अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद 13 अभियुक्तों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
इस मामले में चारों मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट को अदालत में प्रदर्शित ही नहीं किया गया था, और न ही इसे अंजाम देने वाले डॉक्टरों से पूछताछ की गई। पुलिस ने अभियुक्तों की पहचान के लिए कोई भी टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड आयोजित नहीं की। गवाहों ने सीधे तौर पर लगभग आठ साल बाद कोर्ट में पहली बार अभियुक्तों की पहचान की, जिसे अदालत ने कानूनी रूप से सुरक्षित नहीं माना। पुलिस अधिकारियों ने खून से सनी मिट्टी, खाली कारतूस (खोखा), लाठी और अन्य भौतिक साक्ष्यों को जब्त करने के लिए कोई जब्ती सूची तैयार नहीं की थी और न ही उन्हें फॉरेंसिक लैब भेजा गया। अदालत ने कहा कि पुलिस और जांच एजेंसियों की घोर लापरवाही के कारण न्याय प्रणाली प्रभावित हुई है।
सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने बिहार के पुलिस महानिदेशक को यह निर्देश दिया है कि वे लापरवाह जांच अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा के लिए तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की एक समिति बनाएं और तीन महीने के भीतर उचित प्रशासनिक कार्रवाई करें।
