
विवेकानंद कुशवाहा
बिहार के बाहर मोदी जी का हिंदुत्व वाला ‘चेहरा’ एक फैक्टर होगा, लेकिन बिहार में उस नजरिये से नरेंद्र मोदी कोई फैक्टर नहीं हैं। अब तक हुए तीनों चरणों के चुनाव के रुझान इस बात की तसदीक करते हैं। अब तक बिहार में 14 सीटों पर मतदान हुए हैं।



वहीं, चौथे चरण में बिहार में 5 सीटों में से दो सीटों उजियारपुर और बेगूसराय सीट पर मोदी सरकार के मंत्री नित्यानंद राय और गिरिराज सिंह के किस्मत का फैसला होना है। उसके अलावा नीतीश जी के खासमखास रहे ललन सिंह के लिए चुनौती की घड़ी है। 13 मई को हो रहा चौथे चरण का चुनाव, लोकसभा चुनाव, 2024 का मिड स्टेज भी है।
यहां से आधे से अधिक सीटों पर चुनाव संपन्न हो जायेंगे। बिहार में भी लगभग आधी सीटों पर चुनाव हो जायेंगे। इस चरण में सिर्फ उम्मीदवार ही नहीं, बल्कि उनके नेताओं की राजनीतिक साख भी दांव पर है। पीएम मोदी इसके लिए आज पहली बार पटना में रोड शो करेंगे। चुनावी तारीख 13 मई को भी मोदी जी की बिहार में कई रैलियां निर्धारित हैं।
1. मुंगेर (ललन सिंह बनाम कुमारी अनिता महतो)
मुंगेर बिहार की ऐतिहासिक धरती है। इसी क्षेत्र में अंग और मगध का मिलन होता है। इसके अंदर मुंगेर, जमालपुर, सूर्यगढा, लखीसराय, मोकामा और बाढ़ विधानसभा शामिल हैं। विधानसभा की स्थिति देखें तो 2020 में छह में से तीन पर भाजपा, दो पर राजद और एक पर कांग्रेस के उम्मीदवार विजयी हुए थे। उनमें से दोनों राजद वाले अभी एनडीए के साथ चले आये हैं। 2008 के परिसीमन में मुंगेर लोकसभा के सामाजिक समीकरण को जानबूझकर बदलने की कोशिश की गयी और बाढ़ व मोकामा जैसे पटना जिले की विधानसभाओं को भी इस क्षेत्र का हिस्सा बना दिया गया। नतीजा यह हुआ कि मुंगेर लोक सभा में दो विधानसभा मुंगेर के, दो लखीसराय जिले के और दो पटना जिले के विधानसभा शामिल हो गये।
इसके बाद से यह भूमिहार लैंड बन गया 2009 में ललन सिंह, 2014 में सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा सिंह और फिर 2019 में ललन सिंह यहां से सांसद बने। दरअसल, यहां जदयू के सबसे कोर वोटर कुर्मी-धानुक सर्वाधिक संख्या में हैं। ऐसे में कुर्मी, धानुक, कुशवाहा और भूमिहार का कंबिनेशन बहुत मजबूत हो जाता रहा है।
इसमें नीतीश जी के नाम पर अन्य अतिपिछड़े और भाजपा के नाम पर अन्य सवर्ण के जुड़ने से एनडीए का उम्मीदवार अजेय हो जाता है, लेकिन इस बार कहानी अलग है। राजद ने अशोक महतो की पत्नी को उम्मीदवार बनाया है। अशोक महतो अपने क्षेत्र में पिछड़ों/अतिपिछड़ों/दलितों के बीच रॉबिनहुड रहे हैं। वह कुर्मी जाति से आते हैं, वहीं उनकी पत्नी कुमारी अनिता धानुक जाति से ताल्लुक रखती हैं, जो चुनावी मैदान में खुद हैं। ऐसे में एमवाई के साथ यदि धानुक, कुर्मी, कुशवाहा वोट राजद की ओर शिफ्ट कर जाये, तो ललन सिंह के लिए भारी मुश्किल हो जायेगी।
2. बेगूसराय (गिरिराज सिंह बनाम अवधेश राय)
बेगूसराय में टक्कर भगवा बनाम लाल झंडे की है। भूमिहार समाज के सिरमौर गिरिराज सिंह और यदुवंशी समाज से आने वाले कॉमरेड अवधेश राय के बीच मुख्य मुकाबला है। एक जमाने में बेगूसराय कम्युनिस्ट का गढ़ हुआ करता था, लेकिन इधर बीते दशकों से हवा भाजपा की बह रही है। यहां टक्कर तभी संभव है, जब धानुक जैसी अतिपिछडी जातियों के मतदाता भाजपा से टूटें। मुकेश सहनी का साथ होना महागठबंधन के लिए मजबूत पक्ष है। हालांकि, बेगूसराय जीतने के लिए जरूरी है कि कुशवाहा मतों में भी महागठबंधन सेंधमारी करे। अन्यथा गिरिराज सिंह के लिए लड़ाई आसान हो सकती है।
3. उजियारपुर (नित्यानंद राय बनाम आलोक मेहता)
दो बार से सांसद रहे नित्यानंद राय के लिए इस बार उजियारपुर की लडाई एक बड़ी चुनौती है। आप इसे इस बात से भी समझ सकते हैं कि यहां की एक सभा में गृह मंत्री अमित शाह ने खासतौर से कुशवाहा समाज को याद दिलायी कि कैसे बीजेपी और मोदी जी ने उपेंद्र कुशवाहा को केंद्र में मंत्री व सम्राट चौधरी को डिप्टी सीएम बनाकर कुशवाहा समाज को सम्मान दिया है।
2019 में उजियारपुर से महागठबंधन से उपेंद्र कुशवाहा उम्मीदवार थे, उनको न तो ठीक से कुशवाहा समाज का वोट मिला, न ही राजद के कोर वोटर का वोट उनको ट्रांसफर हो पाया। इससे 2019 में नित्यानंद राय को बड़ी जीत मिली, लेकिन 2014 में जब आलोक मेहता राजद से उनके सामने थे, तो नित्यानंद राय को किस्मत से जीत मिली थी।
क्योंकि, त्रिकोणीय संघर्ष का उन्हें लाभ मिला। उस समय आलोक मेहता को 2 लाख 56 हजार मत मिले थे, जबकि अश्वमेघ देवी को 1 लाख 20 हजार मत मिले और सीपीएम के रामदेव वर्मा को 54 हजार मत मिले थे। ये तीनों एक ही जाति से आते हैं।
वहीं, नित्यानंद राय को 3 लाख 17 हजार मत मिले और नित्यानंद जी चुनाव जीत गये। चूंकि, आलोक मेहता राजद के सबसे समर्पित सिपाहियों में से एक हैं। ऐसे में इस बार लालटेन निशान से आलोक मेहता का उम्मीदवार होना यदुवंशी वोटर को एकजुट रख सकता है। साथ ही दो बार से सांसद रहने की एंटी इंकमबेन्सी भी नित्यानंद राय को लेकर है। ऐसे में तय है कि यहां लड़ाई कांटे की होगी।
4. समस्तीपुर (शांभवी चौधरी बनाम सन्नी हजारी)
इस सीट पर लड़ाई भले सिम्बॉल के लेवल पर लोजपा (आर) और कांग्रेस के बीच है, लेकिन असल में यह लडाई बिहार सरकार में जदयू के दो मंत्रियों के बच्चे के बीच हो गयी है। टिकट बन्टवारे में जिस तरह चिराग पासवान ने मनमानी की है, उससे भी यहां की लड़ाई दिलचस्प है। यहां जदयू के कोर वोटर पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा। अगर जदयू के वर्कर 2020 के दिन को याद रखे रहे तो लोजपा के लिए यह सीट फंस सकती है। ऊपर से पासवान समाज के लोग चिराग को देख कर वोट करते हैं या सन्नी हजारी को, इस पर भी नतीजे निर्भर करेंगे।
5. दरभंगा (गोपाल जी ठाकुर बनाम ललित यादव)
गोपाल जी के साथ जहां मोदी जी का नाम जुड़ा है, वहीं ललित यादव के पास घोषणा के बाद भी दरभंगा में एम्स न बन पाने जैसे मुद्दे। यहां मुकेश सहनी फैक्टर यदि महागठबंधन के पक्ष में काम कर जाता है तो लड़ाई मजेदार हो जायेगी।

