
पटना। बिहार विधानसभा चुनाव-के परिणामों ने साफ कर दिया है कि जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर रणनीति बनाने वाले उस्ताद जरूर हैं, लेकिन नेतृत्व की बुनियादी शर्तों पर वह पूरी तरह विफल साबित हुए हैं। करोड़ों रुपये लेकर राजनेताओं को सलाह देने वाले प्रशांत किशोर अपनी ही बनाई राजनीतिक पर टिक नहीं पाए। बिहार की जनता ने उनकी पार्टी को एक भी सीट न देकर पूरी तरह से उन्हें नकार दिया है।
रणनीति में माहिर, लेकिन नेतृत्व से दूर : प्रशांत किशोर ने अपनी रणनीति से देश की कई बड़ी पार्टियों का भविष्य पलट दिया, लेकिन जब बात जनता को साथ लेकर चलने की आई, तो धैर्य, विनम्रता और जनसंपर्क की क्षमता में उनकी कमी खुलकर सामने आ गई। नेतृत्व का मतलब सिर्फ भाषण नहीं होता, बल्कि उन लोगों के साथ खड़े होना होता है, जो असहमत हों, असंतुष्ट हों या छोटी हैसियत रखते हों। प्रशांत किशोर इस परीक्षा में खरे नहीं उतरे। चुनाव अभियान के दौरान चाहे कार्यकर्ता हों, पत्रकार हों या समर्थक, हर जगह एक बात लगातार सुनाई दी कि प्रशांत किशोर का व्यवहार अपमानजनक है। ऊंचाई का भाव, तीखे जवाब और जनता से दूरी। यही वह विष था, जिसने उनकी राजनीति को अंदर से खोखला कर दिया। बिहार में यह स्टाइल नहीं चलता। यह वह जमीन है, जहां जनता अपने नेता को सिर पर नहीं, कंधे पर देखना पसंद करती है।
प्रशांत किशोर एक बड़ी भूल कर बैठे। उन्होंने मान लिया कि पार्टी में आने वाले हर व्यक्ति उतना ही ईमानदार होगा, जितना वे खुद हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि महात्मा गांधी ने भी असहयोग आंदोलन में पूरे देश से अहिंसा की प्रतिज्ञा ली थी, फिर भी चौरीचौरा में भीड़ ने थाना जला दिया। हंटर कमीशन ने पूछा कि आपने कैसे मान लिया कि हर आदमी आपके जैसा है? प्रशांत किशोर की गलती भी ठीक यही है। वे अपने जैसा चरित्र दूसरों में खोजते रहे और राजनीति उनसे दूर होती गई।
भारत की राजनीति को समझ नहीं पाए पीके
राजनीतिक विश्लेषक चन्द्रमा तिवारी का मानना है कि भारतीय राजनीति में नियम सरल है। जितना शातिर, उतना लोकप्रिय। जितना विनम्र दिखोगे, उतनी तालियां। जनता के सामने झुको, पीठ पीछे राजनीति चलाओ, यही कारण है कि ईमानदार लोग नेता नहीं, सलाहकार बनते हैं। प्रशांत किशोर इस बुनियादी सच को समझ ही नहीं पाए।
चन्द्रमा तिवारी ने बताया कि बिहार की गलियों में अक्सर एक लाइन सुनी जाती है कि राजनीति में गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। प्रशांत किशोर ने यह कला नहीं सीखी। नतीजा यह हुआ कि भीड़ नहीं जुटी, संगठन नहीं खड़ा हुआ और जनता उनसे दूर होती गई। नीतियों के किताबों से नहीं, धूलझ्रधक्कड़ झेलकर नेता बनते हैं। उन्होंने बताया कि अब प्रशांत किशोर के सामने दो ही रास्ते हैं। बिहार में टिककर राजनीति सीखें, अहंकार छोड़ें या मान लें कि राजनीति उनके बस की चीज नहीं। वे देश के सबसे महंगे चुनाव सलाहकार हैं, लेकिन यह सच्ची सलाह उन्हें कोई कीमत देकर भी नहीं मिलती। राजनीति आपकी जमीन नहीं है।———–
