
रांची। माता-पिता ने बड़े अरमानों से बेटे का नाम रखा था—राजकुमार। सोचा था कि यह बेटा परिवार का सहारा बनेगा, घर-आंगन खुशियों से महकेगा। मगर किस्मत ने ऐसा दांव खेला कि 55 साल के राजकुमार आज खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर हैं। चंद मिनटों में मलबे में तब्दील हो गया आशियाना : एचईसी प्रबंधन के आदेश पर चला बुलडोजर उनके जीवन भर की कमाई, यादें और सपनों को आशियाना चंद मिनटों में मलबे में तब्दील हो गया। जिस घर की दीवारों पर कभी शादी-ब्याह की सजावट टंगी रहती थी, आँगन में बच्चों की किलकारियाँ गूँजती थीं, उसी घर की जगह अब सिर्फ़ ईंट-पत्थरों का ढेर बचा है।
रूंधे आवाज में राजकुमार कहते हैं कि जिस घर में भाई-बहनों की शादियाँ कीं, बच्चों की परवरिश की। आज उसी घर को टूटा देख रहा हूँ। ऊपरवाला भी खामोश है और नीचेवाले सिर्फ़ वादे करते हैं।
यह दर्द अकेले राजकुमार का नहीं। नारायण, शिवकुमार, शिव चरन, हरेन्द्र यादव, रंजन जैसे दर्जनों हिन्दू परिवारों का आशियाना एक ही पल में उजड़ गए। जिन घरों में कल तक रोटी की खुशबू उठती थी, आज वहां सिर्फ धूल, मलवा और सन्नाटा है और सबकी आँखों में आंसू।
नारायण अपनी टूटी चारपाई के पास खड़े होकर कहते हैं कि बेटी की शादी के लिए कपड़े और बर्तन इकट्ठा कर रहा था। अब न घर बचा, न सामान। बेटी की आँखों में आँसू देख दिल रो देता है।
शिवकुमार की बूढ़ी पत्नी हिचकियों के बीच कहती हैं कि यही घर तो हमारी आखिरी उम्मीद था। अब बुढ़ापे में कहां जाएंगे? किस दरवाजे पर सिर झुकाएँगे?
शिव चरण हाथ में ईंट का टुकड़ा लिए सुबकते हुए कहते हैं कि हमारे बच्चों के बचपन की हंसी इसी आंगन में गूंजी थी। अब ये मलबा हर रोज हमें चुभेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार कहते हैं कि हर गरीब को पक्का मकान मिलेगा।
लेकिन सवाल यह है कि जिनके पास पहले से पक्का घर था और अब उन्हें बेघर कर दिया गया, उनके जख्मों पर मरहम कौन लगाएगा?
