रांची। झारखंड उच्च न्यायालय ने बोकारो जिले के चर्चित तेतुलिया जमीन विवाद मामले में चल रही जांच की न्यायिक निगरानी (मॉनिटरिंग) करने से इनकार कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल आशंकाओं के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं होगा कि मामले की जांच कर रही एजेंसियां आरोपितों को किसी प्रकार का लाभ पहुंचाएंगी। अदालत ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में जांच की न्यायिक निगरानी की आवश्यकता नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने सोमवार को इस मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।

याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया था कि बोकारो जिले के तेतुलिया मौजा स्थित 103 एकड़ भूमि से जुड़े मामले की जांच की निगरानी न्यायालय स्वयं करे। याचिका में दावा किया गया था कि यह भूमि वर्ष 1958 में वनभूमि के रूप में अधिसूचित की गई थी और इसकी वर्तमान अनुमानित कीमत लगभग 172 करोड़ रुपये है। आरोप लगाया गया था कि इस भूमि की खरीद-बिक्री और स्वामित्व से जुड़े मामलों में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं, जिसकी जांच वर्तमान में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) द्वारा की जा रही है।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया था कि बोकारो के प्रभागीय वन पदाधिकारी (डीएफओ) की शिकायत के आधार पर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में जालसाजी, धोखाधड़ी और अन्य संबंधित धाराओं के तहत शिकायत वाद दर्ज किया गया है। इसके अलावा राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति ने अपनी रिपोर्ट में तेतुलिया की उक्त भूमि को वनभूमि माना था।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि भूमि सौदे से जुड़े कुछ आरोपित अत्यंत प्रभावशाली हैं और इस कारण जांच एजेंसियों द्वारा उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मदद पहुंचाए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर न्यायालय से जांच की निगरानी का अनुरोध किया गया था।

हालांकि,अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा दाखिल शपथपत्रों और प्रस्तुत दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद कहा कि फिलहाल ऐसे कोई ठोस तथ्य या साक्ष्य सामने नहीं आए हैं, जिनके आधार पर यह माना जा सके कि जांच एजेंसियां निष्पक्ष तरीके से काम नहीं कर रही हैं या आरोपितों को संरक्षण दे रही हैं। न्यायालय ने कहा कि केवल आशंका के आधार पर जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा।

अपने आदेश में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर दिया जाना चाहिए। साथ ही न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय और अन्य जांच एजेंसियों को निर्देश दिया कि वे मामले की जांच पूरी निष्पक्षता, पारदर्शिता और कानून के अनुरूप करते हुए उसे तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाएं।–

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