
बीजिंग । भारत की मेजबानी में हो रहे 18वें ब्रिक्स समिट में रूस, चीन, ईरान और दूसरे सदस्य देशों के नेता शामिल हो रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा नजर चीनी प्रेसिडेंट शी जिनपिंग पर हैं। जिनपिंग सात साल बाद भारत आ रहे हैं। 2020 में गलवान घाटी की झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्ते निचले स्तर पर पहुंच गए थे। जिनपिंग की दिल्ली में ब्रिक्स समिट से इतर द्विपक्षीय बैठक होने की उम्मीद है। ऐसे में इसे दोनों देशों के रिश्ते के लिहाज से अहम माना जा रहा है। इस बीच चीन की ओर से जिनपिंग के दिल्ली आने को भारत के लिए एक बड़ा मौका बताने की कोशिश की गई है।



चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक विश्लेषण में कहा है कि शी जिनपिंग का दिल्ली आना भारत के लिए बीजिंग से रिश्ते बेहतर करने का मौका है। अखबार ने कहा है कि चीन की तरक्की से ग्लोबल साउथ के देशों को सीखना चाहिए। चीन ने हर क्षेत्र में तरक्की की है। ऐसे में चीन से बेहतर रिश्ते रखने का भारत को फायदा मिलेगा।
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लेख कहता है कि मिलिट्री और आर्थिक ताकत के अलावा कई ऐसी बातें हैं, जो चीन को ग्लोबल लीडरशिप के लिए आकर्षक उम्मीदवार बनाती हैं। खासतौर से उन देशों के लिए, जो एक भरोसेमंद पार्टनर की तलाश में हैं। चीन ने विदेशों में अपना पॉलिटिकल मॉडल थोपने की कोशिश नहीं की है। बीजिंग ने व्यापार, निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर का रिश्ते बनाने का रास्ता चुना है।
चीन का विदेशों के साथ जुड़ाव पॉलिटिकल दखल के बजाय आर्थिक हितों पर है। उसकी डिप्लोमेसी में जासूसी, सरकार बदलने या सोशल इंजीनियरिंग की कोशिशों का डर नहीं है। व्यापार और विकास को केंद्र में रखकर चीन खुद को व्यावहारिक पार्टनर के तौर पर पेश करता है। यह बदलते कॉम्पिटिटिव ग्लोबल जियोपॉलिटिकल माहौल में ज्यादा सुरक्षित विकल्प है।
ग्लोबल टाइम्स कहता है कि ग्लोबल इकॉनमी और इंटरनेशनल ट्रेड के अहम खिलाड़ी भारत के लिए चीन का पड़ोसी होना और उसके साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखना बहुत फायदेमंद है। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक अविश्वास और अनसुलझे सीमा विवाद के बावजूद चीन के साथ भारत की नजदीकी फायदेमंद है। चीन लंबे समय से भारत का नंबर 1 व्यापारिक साझेदार रहा है और भारत को एक दीर्घकालिक व्यापारिक साझेदार के रूप में देखता है। दिल्ली को इस पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। यह भारत के लिए चीनी अर्थव्यवस्था की ताकत का लाभ उठाकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का एक बड़ा अवसर है।
चीन के क्षेत्र के हर देश के साथ संबंध सहयोगपूर्ण रहे हैं। भारत को भी पीछे नहीं रहना चाहिए। चीन के साथ अच्छे संबंधों से कुछ भी खोने को नहीं है बल्कि सब कुछ पाने को है। ऐतिहासिक रूप से चीन ने भारत से सहयोग करना चाहा है। दोनों देशों के बीच आर्थिक, सैन्य और तकनीकी अंतर है। फिर भी चीन की कोशिश भारत और दूसरे पड़ोसियों के साथ मिलकर आगे बढ़ने की है। हाल के तनावों के बावजूद चीन ने बार-बार संबंधों में सुधार की इच्छा जताई है। भारत को चीन के साथ अपनी साझेदारी को गंभीरता से मजबूत करने की जरूरत है। मौजूदा अमेरिकी प्रशासन के साथ भारत के संबंधों को तनावपूर्ण ही कहा जाएगा। निकट भविष्य में किसी सुधार की कम संभावना को देखते हुए भारत के लिए चीन के साथ स्थिर और रचनात्मक संबंध और जरूरी हो जाते हैं।

