
रांची। झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत ने वैवाहिक विच्छेद के एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा है कि जहां विश्वास खत्म हो जाए, वहां वैवाहिक संबंध का टिके रहना संभव नहीं होता।



अदालत ने जमशेदपुर फैमिली कोर्ट के वर्ष 2024 का आदेश निरस्त करते तलाक की अनुमति प्रदान कर दिया। जमशेदपुर फैमिली कोर्ट ने पत्नी की याचिका खारिज करते हुए तलाक की अनुमित नहीं दी थी। जिस आदेश को पत्नी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पत्नी को दो बेटियों होने की वजह से मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना दी गई। पति और सास के व्यवहार से साथ रहना असंभव हो गया था। खंडपीठ ने कहा फैमिली कोर्ट ने साक्ष्य का सही मूल्यांकन नहीं किया।
विवाह आपसी विश्वास और सम्मान पर आधारित होता है और जब यह पूरी तरह टूट जाए तो संबंध को जबरन बनाए रखना उचित नहीं है। प्रार्थी सुमन कुमारी (बदला हुआ नाम) ने अपने पति सुनील कुमार (बदला हुआ नाम) के खिलाफ हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक की मांग की थी।
दोनों की शादी 14 अगस्त 2014 को जमशेदपुर के एक मंदिर में हुई थी। शादी के बाद उन्हें दो बेटियां हुईं। पत्नी का आरोप था कि बेटियों के जन्म के बाद पति का व्यवहार बदल गया।
पति शराब पीकर गाली-गलौच करता था। सास भी पति का साथ देती थी। कई बार मारपीट कर घर से निकाल दिया गया। इन परिस्थितियों के कारण पत्नी 2019 से अलग रह रही थी। हाई कोर्ट के जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत ने एक वैवाहिक विवाद पर फैसला सुनाते हुए पति को तलाक की अनुमति प्रदान कर दी। कोर्ट ने 30 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देना अनिवार्य कर दिया।
हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी की कोई स्वतंत्र आय नहीं है, इसलिए उसका भविष्य सुरक्षित करना जरूरी है। अदालत ने पति की आय और भविष्य की कमाई को ध्यान में रखा। अदालत ने कहा कि पत्नी को वही जीवन स्तर मिलना चाहिए, जैसा वह शादी के दौरान जी रही थी। पति अर्जुन मांझी (बदला हुआ नाम) ने पत्नी मंगली देवी (बदला हुआ नाम) से तलाक की मांग की थी। हाई कोर्ट बोकारो फैमिली कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया और विवाह को भंग घोषित किया। खंडपीठ ने कुछ शर्त भी लगाई है, जिसमें पति को अपनी पत्नी को 30 लाख रुपये एकमुश्त गुजारा भत्ता देना होगा।
यह राशि तीन बराबर किस्तों में 12 महीने के अंदर चुकानी होगी। बेटे का पैतृक संपत्ति पर अधिकार बना रहेगा, वह कानून के अनुसार अपना हक मांग सकता है।

