
नई दिल्ली। केंद्र सरकार वक्फ बोर्ड संशोधन बिल आज लोकसभा में पेश होने जा रहा है। इसे लेकर लोकसभा के बिजनेस अडवाइजरी कमिटि में चर्चा हुई। जब से इस बिल के संसद में आने की बात और बिल के मसौदा सामने आया है, मुस्लिम समाज से लेकर मुस्लिम नेताओं और विपक्ष में इसे लेकर खासा रोष दिखाई दे रहा है। इसकी वजह मानी जा रही है कि संशोधित बिल के जरिए सरकार वक्फ बोर्ड की ताकत व हैसियत कम करने जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस बिल के जरिए सरकार देश के वक्फ बोर्ड्स की पूरी प्रक्रिया जवाबदेह व पारदर्शी बनाना चाहती है।



इस बिल को लेकर विवाद का सबसे बड़ा बिंदु वक्फ बोर्ड की संपत्ति है। दरअसल, देश में कुल 32 वक्फ बोर्ड हैं। इनके बीच तालमेल के लिए केंद्र सरकार के अल्पसंयख्क मामलों के मंत्रालय की ओर से सेंट्रल वक्फ काउंसिल बनाया गया। यह वक्फ बोर्डों के कामकाज के मामलों में केंद्र सरकार को सलाह देती है। वर्ष 1995 में वक्फ एक्ट में बदलाव भी किया गया और हर राज्य/केंद्र शासित प्रदेश में वक्फ बोर्ड बनाने की मंजूरी दी गई। है। देश के कुल वक्फ बोर्ड के पास फिलहाल आठ लाख एकड़ जमीन है। साल 2009 में यह संपत्ति चार लाख एकड़ हुआ करती थी। इन जमीनों में ज्यादातर हिस्सों में मस्जिद, मदरसा और कब्रिस्तान हैं। दिसंबर 2022 तक वक्फ बोर्ड के पास कुल 8,65,644 अचल संपत्तियां थीं। अचल सपंत्ति के लिहाज से देखा जाए तो वक्फ बोर्ड देश में रेल व सेना के बाद तीसरे सबसे बड़े जमीन के मालिक हैं।
2013 में मिली थी मजबूती : 2013 में यूपीए सरकार के समय में वक्फ बोर्ड कानून में संशोधन कर इन्हें असीमित अधिकार दे दिए गए थे। मौजूदा कानून के तहत केंद्र सरकार, राज्य सरकार या कोर्ट तक संपत्ति विवाद के मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं। अगर किसी जमीन को लेकर कोई विवाद होता है तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी वक्फ बोर्ड की नहीं, बल्कि दूसरी पार्टी की होती है। बोर्ड को अपना मालिकाना हक साबित करने के लिए किसी तरह तरह का कोई सबूत या दस्तावेज नहीं देना होता। बिल लाने की वजह यह भी है कि इनके पास जितनी जमीन है और इनके द्वारा जो रेवेन्यु दिखाया जा रहा है, उनमें आपस में मेल नहीं दिखता। वक्फ बोर्ड महज साल का 200 करोड़ का राजस्व दिखाता है। इन्हीं बिंदुओं के चलते वक्फ बोर्ड के पास मौजूद इन असीम शक्तियों को लेकर कई ओर से विरोध के सुर उठते रहे। यहां तक कि सच्चर कमिटि ने भी अपनी रिपोर्ट में वक्फ बोर्ड के कामकाज में पारदर्शिता की बात कही। उल्लेखनीय है कि यूपीए सरकार में हुए बदलाव के बाद से आम मुस्लिम, गरीब मुस्लिम महिलाएं, तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के बच्चे, शिया व बोहरा जैसे समुदाय लंबे समय से मौजूदा कानून में बदलाव की मांग कर रहे थे। इन लोगों की दलील थी कि वक्फ में आज आम मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है, सिर्फ रसूखदार लोगों को ही जगह मिलती है।
संशोधन बिल के प्रमुख बिंदु
प्रस्तावित बिल में सरकार द्वारा कुल 40 संशोधन किए गए हैं। बिल में वक्फ शब्द को कम से कम पांच सालों से इस्लाम का पालन करने वाले और ऐसी संपत्ति के मलिकाना हक वाले व्यक्ति द्वारा स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाएगा।
वक्फ संपत्ति उत्तराधिकार में महिलाओं को भी ऐसी संपत्तियों का उत्तराधिकारी बनाने की बात है। वक्फ संपत्तियों के सर्वे के लिए जिला कलेक्टर स्तर अधिकारी फैसला लेगा। वक्फ बोर्ड को अपनी संपत्ति जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तर में रजिस्टर्ड करानी होगी, ताकि संपत्ति का मूल्यांकन हो सके। वक्फ बोर्ड के रेवेन्यु की जांच हो सकेगी। केंद्रीय वक्फ काउंसिल और राज्य व केंद्र शासित वक्फ बोर्ड मुस्लिम महिलाओं और गैर मुसलमानों का प्रतिनिधित्व हो। बोहरा समुदाय और अघाखानी के लिए एक अलग वक्फ बोर्ड की गठन किया जाए।
बोर्ड में मुस्लिम समुदायों में शिया, सुन्नी, बोहरा, अघाखानी और अन्य पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व होगा। नई बिल के मुताबिक वक्फ बोर्ड काउंसिल और वक्फ बोर्ड में दो-दो महिला सदस्यों का होना अनिवार्य होगा।
संपत्ति का रजिस्ट्रेशन एक सेंट्रल पोर्टल और डाटा बेस के जरिए किया जाएगा।
नए बिल में प्रावधान है कि बोर्ड अब यह तय करने का एकमात्र अधिकारी नहीं रहेगा कि कोई संपत्ति वास्तव में वक्त बोर्ड की है या नहीं।
नए बिल में कहा गया है कि जिन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में वक्फ बोर्ड नहीं है, वहां विवाद होने पर ट्रिब्यूनल जाया जा सकता है।

