
पटना। बिहार के गांवों में जीविका दीदियां अब पशुओं की सेहत सुधारने के साथ पशुपालकों की आय बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभा रही हैं। प्रशिक्षित पशु सखियां पशुओं की प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, टीकाकरण, कृमिनाशक दवाओं के उपयोग और संतुलित आहार के संबंध में सलाह देकर पशुधन के संरक्षण में मदद कर रही हैं। राज्य के विभिन्न जिलों में कुल 8,992 पशु सखियां सेवाएं दे रही हैं। जीविका की इस पहल से ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार के अवसर बढ़े हैं।वहीं, पशुपालकों को गांव में ही पशुओं की प्राथमिक देखभाल और जरूरी सलाह मिल रही है। जिलेवार आंकड़ों के अनुसार, गया में सर्वाधिक 540 पशु सखियां कार्यरत हैं। मुजफ्फरपुर में 443, कटिहार में 432, नवादा और पूर्णिया में 430-430 तथा नालंदा में 424 पशु सखियां सेवाएं दे रही हैं।पशु सखी के रूप में महिलाओं की सफलता की एक मिसाल लखीसराय जिले के चानन प्रखंड की ईंटोन पंचायत स्थित मननपुर गांव की खुशबू कुमारी हैं। इंटरमीडिएट उत्तीर्ण खुशबू वर्ष 2019 में जीविका के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी थीं। उन्होंने खेती में निवेश के लिए समूह से एक लाख रुपये का ऋण लिया। इससे खेती के जरिए उन्हें प्रतिवर्ष 40 से 50 हजार रुपये तक मुनाफा होने लगा। उनकी सक्रियता को देखते हुए वर्ष 2023 में पशु सखी के रूप में चयन किया गया। जीविका से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद वह गांव-गांव जाकर पशुओं की देखभाल और पशुपालकों को जागरूक करने लगीं। खुशबू विशेष रूप से बकरीपालकों को स्वास्थ्य निगरानी, कृमिनाशक दवाओं के उपयोग, विटामिन और प्राथमिक उपचार की जानकारी देती हैं।साथ ही पीपीआर और ईटी जैसी बीमारियों से बचाव के लिए टीकाकरण के प्रति जागरूक करती हैं। उनके प्रयासों से पशुपालकों में बकरियों की देखभाल को लेकर जागरूकता बढ़ी है और उनकी मृत्यु दर कम करने में मदद मिली है। ग्रामीण महिलाएं उन्हें स्नेह से डॉक्टर दीदी कहती हैं।पशुधन की सुरक्षा से आय बढ़ाने में मदद : ग्रामीण बिहार में पशुपालन अनेक परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार है। पशुओं के बीमार होने या समय पर उपचार नहीं मिलने से पशुपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे में प्रशिक्षित पशु सखियां बीमारियों की पहचान, समय पर टीकाकरण, कृमिनाशक दवाओं और संतुलित आहार के बारे में सलाह देकर नुकसान कम करने में मदद कर रही हैं। स्थानीय स्तर पर इनकी उपलब्धता से पशुपालकों को शुरूआती देखभाल और जरूरी मार्गदर्शन के लिए सहायता मिलती है। इससे पशुधन के संरक्षण के साथ पशुपालन को अधिक लाभकारी बनाने की संभावनाएं बढ़ती हैं।
